तो क्या भगवान श्री रामचन्द्र जी ने अपने बचपन में दीपावली नहीं मनाई थी?

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क्या दीपावली आर्यो का पर्व/त्यौहार है?
हिन्दू कहते हैं दीपावली इसलिए मनाते है क्यों की इस दिन भगवान श्री रामचन्द्र जी आज के दिन श्रीलंका से विजय प्राप्त कर अयोध्या आये थे | जैनी कहते हैं दीपावली इसलिए मनाई जाती है क्यों इस दिन महावीर…… सिक्ख कहते हैं दीपावली इसलिए मानते हैं क्यों की इस दिन गुरु……. और इसी प्रकार बुद्धिस्ट….कुछ भी कल्पना गढ़ते रहते है।

KONICA MINOLTA DIGITAL CAMERA
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प्रश्न :- तो क्या भगवान श्री रामचन्द्र जी ने अपने बचपन में दीपावली नहीं मनाई थी?

क्या संत महावीर जी ने बचपन में दीपावली नहीं मनाई थी ??
क्या हमारे सिख गुरुओं ने बचपन में दीपावली नहीं मनाई थी ??
या इनके पूर्वजों ने दीपावली नहीं मनाई थी?

आइये इसकी सत्यता जाने कि दीपावली कब से है, इसको क्यों और कौन मनाते है?

उत्तर :- यह सनातन (मानवता) का पर्व है, सत्यता यह है की दीपावली पर्व इस सृष्टि के प्रारम्भ (1,96,08,53,117वर्ष पूर्व) होने के साथ ही शुरू हो चुका था। क्योंकी इसका मूल कारण कोई व्यक्ति विशेष या घटना विशेष नहीं है, जब की मूल कारण है नई फसल का आगमन और उस फसल के स्वागत व खुशी को व्यक्त करने के लिए कृषक (किसान) जो मिलन का आयोजन करता है वह उत्सव कारण है।

सबके साथ मिलकर ईश्वर का धन्यवाद करने के लिए विशेष यज्ञ का आयोजन होता है जिसमें नई फसल से आये अन्न को यज्ञ-अग्नि में डाला जाता है और फिर सब उसका अपने अपने घर पर उपभोग करते हैं। इस यज्ञ को शारदीय नवसस्येष्टि कहते हैं। नवसस्येष्टि = (नव=नवीन+सस्य=फसल वा खेती + इष्टि=यज्ञ, अर्थात् नवीन फसल के अन्न का यज्ञ) करने का विधान है।

शारदीय का अर्थ है शरद ऋतु में किया जाने वाला यज्ञ। यज्ञ का अर्थ ही होता है देवपूजा-संगतिकरण-दान। दीपावली के दिन कृषक यज्ञ करता है अर्थात् उस परमात्मा को धन्यवाद देता है जिसने उसके परिश्रम में साथ दिया अर्थात् समय पर वर्षा की, धूप दी जिससे अनावश्यक कीड़े मरे, दानों का पोषण हुआ उस परमात्मा का धन्यवाद कर देवपूजा होती है। सारे किसान परस्पर मिल कर यज्ञ करते हैं जो संगतिकरण है और समाज के गरीब वर्ग को अन्न का दान देकर यज्ञ की परिभाषा को आज के दिन सार्थक किया जाता है। मूल रूप में हमारे यहाँ दो फसल होती हैं (१) रवि (२) खरीफ…. जैसे ये दो फसलें आज होती हैं वैसे ही श्री रामचंद्र जी के युग में भी होती थी और उनके पूर्वजों के युग में भी। महावीर स्वामी जी से लेकर गुरुओं के पूर्व भी यह फसल आती थी और उत्सव मनाया जाता था। भगवान् श्री राम और उनके पिताजी दशरथ जी ने भी नवसस्येष्टि किया था क्यों की उस काल में भी अन्न इसी ऋतू में होता था और आगे भी होता रहेगा। श्री राम जी ने तो छोडिये, रावण ने भी नवसस्येष्टि किया था।

वामनावतार के समय भगवान् विष्णु ने भक्त प्रहलाद के पौत्र राजा बली से तीन कदम जमीन माँग कर उन्हें पाताल लोक भेज दिया । इस से देवताओं ने हर्षोल्लास के साथ भी दीपावली मनाया।

इस पर्व का सम्बन्ध किसी प्रकार से किसी-व्यक्ति-विशेष से या घटना विशेष से नहीं है। हाँ, उनकी अमर स्मृति और उनके कृतित्व से प्रेरित होने के लिए स्मरण-धन्यवाद आदि अवश्य करना चाहिए।

अधिक जानकारी के लिए “आर्य पर्व पद्धति” और दयानन्द सरस्वती जी द्वारा रचित “सत्यार्थ प्रकाश” पढ़िए।।

धार्मिक संदर्भ – दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है।

कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए।

एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था। तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।

जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है।

सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। और इसके अलावा १६१९ में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।

नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।
पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली।

महर्षि दयानन्द ने दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।

दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने ४० गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था।

बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे।

मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे।

शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

परंपरा
अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीपावली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीपावली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।

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