आरएसएस (राष्ट्रीय सांप्रदायिक संगठन) के लोग “भगत सिंह” से इतना डरते क्यों है ?

महावीर प्रसाद खिलेरी : आपको याद ही होगा कि वीर सावरकर ने अंग्रेजों से डरकर माफी मांगी और बाद में अंग्रेजों के लिए मुखबिरी की नौकरी कर रहे थे! आपको याद होगा कि अटलबिहारी वाजपेयी को AISF से 1936 में इसलिए निष्कासित कर दिया था क्योंकि वो अंग्रेजो के लिए मुखबिरी करते हुए पकड़े गए!आरएसएस ने देश की आजादी के लिए चल रहे आंदोलन में भाग नहीं लिया था। एक भी कोई संघी आजादी के आंदोलन के लिए शहीद हुए हो तो आप नाम बता सकते हो। आजादी के बाद भी देशसेवा करते हुए कोई संघी मरा हो तो बता दीजिए। आरएसएस व ब्राह्मणवाद की थ्योरी वाले हिंदुत्व के लिए काम करते हुए पंडित दीनदयाल मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर बीमारीं के कारण मर गए थे! वैसे तो उनको कानपुर से दिल्ली पहुंचना था व पहुंच गए पटना! उनकी हत्या के आरोप भी अटल बिहारी पर लगे थे लेकिन यह उनका अंदरूनी झगड़ा था उससे हमे ज्यादा मतलब नहीं है! जब ये हिंदुत्व के ठेकेदार को देश का महापुरुष बताते है तो लोगों को असलियत जाननी जरूरी होती है।

यही हाल श्यामा प्रसाद मुखर्जी का था कालका के पास कहीं सांस फूलने से गुजर गए और ये लोग नारा लगाते है कि “जहां शहीद हुए श्यामा प्रसाद वो कश्मीर हमारा है!” ये धर्म के लिए काम करते हुए मरे और इनको शहीद बता रहे है तो यह बात जाननी जरूरी थी इसलिए चर्चा कर ली।

अब आते है मूल मुद्दे पर। संघ भगत सिंह, लेनिन, कार्ल मार्क्स आदि से डरता क्यों है? क्यों कांग्रेस के गांधी ने भगतसिंह को बचाने की कोशिश नहीं की थी? क्यों राष्ट्रवाद की आंधी से उड़कर दिल्ली पहुंची बीजेपी ने त्रिपुरा से भगतसिंह के खिलाफ शुरुआत की? लेनिन की मूर्ति तोड़ना कोई विदेशी विचारक के ताबूत के टूटने भर का सवाल नहीं है! यह भगतसिंह के खिलाफ बाकी देश से लगभग कटे हुए इलाके में खड़े होकर यह देखना चाहते है कि देश मे अभी भगतसिंह कितना जिंदा है व किस रणनीति से हराया जा सकता है ? उसका आकलन कर रहे है! अभी ढंग से जवाब नहीं मिला तो फिर ये आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। ये भगतसिंह वाले काले अंग्रेज है, ये भगतसिंह वाले धर्म नाम के लुटेरे है। जब जब हमारा भगत जिंदा होता तब तब इनकी धर्म नाम की शोषण की दुकानें कमजोर हो जाती है।

आज अगर इस देश मे ब्राह्मणवाद को सबसे बड़ा खतरा है तो वो भगतसिंह व उनकी विचारधारा से है। बाकी विचारधाराएं लगभग मृतप्राय है या अपने मूल उद्देश्यों से भटकी हुई है। भगतसिंह की विचारधारा मूल रूप से भारतीय परिस्थतियों से निर्मित विचारधारा है। यह विचारधारा पूर्णरूप से वामपंथी विचारधारा नहीं है इसलिए वामपंथियों ने भी पूर्ण रूप से कभी भगतसिंह को स्वीकार नहीं किया था। आपको वामपंथी सरकारों के इलाके में लेनिन, कार्ल मार्क्स का साहित्य खूब नजर आएगा लेकिन जब इनके ऊपर कोई संकट आता है तो वामपंथी लोग खुद के बचाव के लिए भगतसिंह को आगे कर देते है।

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