कम्युनिस्ट इंशा अल्लाह क्यों बोलता है, मुझे उम्मीद है ये पोस्ट पढ़कर अब तक आपको समझ में आ गया होगा!

Chennai: Muslim children hug each other during the celebration of 'Eid-ul-Fitr' at a School ground in Chennai August 9, 2013. The Eid al-Fitr festival marks the end of the Islamic holy fasting month of Ramadan. ..Photo by SL Shanth Kumar

ब्लॉग : शरद श्रीवास्तव –  धर्म जनता के लिए अफीम है। ये मार्क्सवाद का मूलभूत सिद्धान्त है। लेकिन ये कभी भी आश्चर्य की बात नहीं रही की एक धर्म हीन कम्युनिस्ट कब कैसे और क्यों एक मुस्लिम कम्युनलिस्ट के साथ खड़ा मिलता है।

साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले मुस्लिम सांप्रदायकिता से हाथ मिलाते हमेशा नजर आते हैं। तमाम सेक्युलरिज्म एक धर्म के आगे नतमस्तक नजर आता है।

हकीकत ये है की मार्क्सवाद और मुस्लिम साम्प्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में बहुत सी समानताएं हैं। कॉमन गोल यानी उद्देश्य हैं। इसीलिए दोनों एक दूसरे के पूरक और सहायक हैं।

अब विस्तार से : मुस्लिम धर्म एक किताब कुरान से चलता है। कुरान में जो लिखा है वो बदला नहीं जा सकता उसमे कोई फेरबदल मुमकिन नहीं। मार्क्सवाद या कंम्युनिस्ट मार्क्स की किताब दास कैपिटल को वही दर्जा देते हैं। करीब डेढ़ सौ साल पहले लिखी किताब में कोई फेरबदल मुमकिन नहीं। पूर्णतया वैज्ञानिक लेखन। समस्त सृष्टि कैसे चले इसका पूरा विवरण कुरान और दास कैपिटल में मौजूद है।

यूँ तो बाकी लोगों को किसी विषय पर बात करने के लिए उसे समझना पड़ता है , पढ़ना पड़ता है। मेहनत करनी होती है। लेकिन एक मौलवी साहब और एक मार्क्सवादी साहब दुनिया में किसी भी विषय पर बोल सकते हैं , अपनी बात कह सकते हैं। बल्कि ये भी बता सकते हैं की जनता को उस विषय के बारे में क्या करना चाहिए।

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मौलवी साहब और मार्क्सवादी साहब दोनों लोग ये काम कुरान शरीफ और दास कैपिटल शरीफ की रौशनी में करते हैं। यकीन न हो तो आप किसी भी विषय पर इनकी राय लेकर देख लीजिये , एक फतवा देगा दूसरा जनता को होने वाली तकलीफो के बारे में बताएगा।

अगर आप एक मुस्लिम भाई से इस बारे में चर्चा करना चाहेंगे वो कहेगा की पहले कुरान पढ़कर आओ। यही बात आपसे कम्युनिस्ट भाई भी कहेगा , जाओ पहले मार्क्स को पढ़कर आओ।

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