BJP-RSS से ज्यादा हुई है लेफ्ट कार्यकर्ताओं की हत्या, आखिर मीडिया क्यों चलाती है एकतरफा रिपोर्टिंग ?

केशर देवी चौधरी – इन दिनों  भाजपा नेता लगातार केरल की छवि ऐसी बनाने में लगे हैं कि वहां पर राजनैतिक सहिष्णुता नहीं है । विरोधी विचारधारा रखने वाले को मार दिया जाता है। जिसके लिए वहां पर वामपंथी नेताओं को निशाने पर लेते हुए बार-बार बयान दिया जाता है कि भाजपा और RSS को उसकी विचारधारा के लिए निशानदेही करके मारा जा रहा है। भगवा दल जिसको अत्याचार बताने में लगी है दरअसल वह दो राजनैतिक खेमों की लड़ाई है ,जिसमें किसी भी वर्ग पर अत्याचार नहीं बल्कि हिंसक संघर्ष का मामला है।

आंकड़े देखने से बिल्कुल साफ हो जाता है कि वामपंथ और दक्षिणपंथ नेताओं की इन लड़ाई में सबसे ज्यादा जानें वामपंथी नेताओं के ही गई है। इस बात की पहली पुष्टि तो खुद स्टेट के क्राइम रिकॉर्ड से हो जाती है कि मामला दोतरफा है ,जिसमें वाम दल और दक्षिणपंथी दल के कार्यकर्ता बराबर शिकार होते हैं।

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फिर भी अन्य रिपोर्ट पर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है।

केरल से एक मीडिया पत्रकार व हमारी ब्यूरो प्रमुख स्नेहा कोशी के दावों के अनुसार पुलिस रिकॉर्ड कहती है कि पिछले 17 सालों में 172 राजनीतिक हत्याएं हुई है जिनमें से RSS और भाजपा कार्यकर्ताओं की 65 हत्याएं हुई है जबकि सीपीआई{एम} के 85 कार्यकर्ताओं ने जान गंवाई है। और इसी खूनी संघर्ष में कांग्रेस और अन्य दलों के 11 कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी है ।

हां, साल 2016-17 के आंकड़े देख कर लगता है कि बीजेपी आरएसएस नेता इस खूनी खेल के ज्यादा शिकार हुए हैं।

न्यूज़ मिनट में छपी इन तमाम रिपोर्ट्स में देखा जाए तो तस्वीर बेहद भयानक है और जो अफवाह उत्तर भारत में उड़ाई गई है उससे बिल्कुल अलग है।

101 रिपोर्टर्स डॉट कॉम द्वारा डाली गई आरटीआई से जो सूचना मिली उसके अनुसार पिछले 16 सालों में 69 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं जिनमें लगभग बराबर का मामला रहा है । जहां भाजपा और RSS कार्यकर्ताओं की 30 हत्याएं हुई हैं वहीं पर 31 कार्यकर्ता सीपीआई{एम} के थे। एक खास बात यह है कि ये हत्याएं एलडीएफ के शासनकाल के दौरान भी होती रही हैं और यूडीएफ के शासनकाल के दौरान । इन राजनीतिक हत्याओं का केंद्र कन्नूर है ।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े के अनुसार तमाम राजनैतिक हत्याओं का 36 प्रतिशत अकेले कन्नूर से है। एलडीएफ के कार्यकाल के दौरान यह हत्याएं 50% हुई हैं और यूडीएफ के कार्यकाल के दौरान 20 से 30% हत्याएं कन्नूर में हुई हैं । यह तमाम आंकड़े 2000 से 2016 तक के हैं।

अब अगर राजनीतिक हत्याओं के शिकार दक्षिण और वामपंथी दलों के लोग लगभग बराबर हैं तो फिर ऐसी अफवाह किस मंशा से उड़ाई जाती है कि वाम राजनैतिक दल दक्षिणपंथियों की हत्या कर रहे हैं ? विशेषकर उत्तर भारत में मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया है, ऐसी अफवाह उड़ाई है कि सभी के मन में बैठा दिया गया कि केरल में लेफ्ट के नेता दक्षिणपंथियों का शिकार करते हैं।

इन आंकड़ों को देखकर तस्वीर साफ हो जाती है कि मामला अत्याचार का नहीं राजनैतिक रंजिश में दोतरफा खूनी खेल का है। लेकिन ये ज्यादा चिंताजनक बात है कि ऐसी झूठ और अफवाहों को करोड़ों लोगों में मान्यता का रूप मिल जाता है। और अधिकतर लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि उन्हें जो दिखाया, सुनाया और बताया जा रहा है वही सच है ।

अब जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह केरल का दौरा करके आए और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जाकर वहां पर लोगों के मारे जाने पर राजनीति कर रहे हैं, उन्हें इस बात से बचना चाहिए कि किसी राज्य की छवि ऐसी बनाने के क्या मायने हैं जबकि खुद यूपी में लगातार राजनीतिक हत्याएं चरम पर हैं।

यूपी में हो रही हत्याओं की प्रकृति अत्याचार की है यानी कि भाजपा सरकार के बनने के बाद ही विपक्षी दलों के नेताओं की हत्या में तेजी आ गई है । योगी के शपथ लेते ही इलाहाबाद में हुई बसपा नेता की हत्या से संदेश मिल गया कि अब भाजपा के शासन काल में विरोधियों को सहन नहीं किया जाएगा, तब से लगातार ये सिलसिला जारी रहा और अभी दो दिन पहले ही इलाहाबाद में बसपा नेता राजेश यादव की भी हत्या की गई। कम से कम सीएम योगी को तो नैतिक आधार पर अपने गृह राज्य की कानून व्यवस्था ठीक करके ऐसी राजनीतिक हत्याओं को रोक लगानी चाहिए।, नहीं तो किस मुंह से वो दूसरे राज्यों को हिदायत देने गए हैं।

साभार –thenewsminute.com 

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