ब्लॉग: जब गाँव में होता था तो सुबह मेरी आँख दादी की तिलावत (कुरान पढ़ना) से खुलती थी

ब्लॉग: ( Tabish Siddiqui ) – बचपन में मैं जब गाँव में होता था तो सुबह मेरी आँख दादी की तिलावत (क़ुरान पढ़ना) से खुलती थी.. मैं हमेशा उन्ही के पास लेटता था और वो मेरे पास ही बैठकर सुबह क़ुरआन पड़ती थीं.. जब मैं जग जाता तो रोज़ मुझे क़ुरआन में से ही कोई कहानी सुनाती थीं.. धीरे धीरे मुझे क़ुरान की लगभग हर घटनाएं याद हो गयी थीं.. क़ुरान सही मायनों में मैंने अपनी दादी से सीखा था।

मेरी दादी का मायका पहले शिया संप्रदाय का मानने वाला हुवा करता था.. बाद में सब सुन्नी हो गए मगर शिया परंपराओं को सब उसी तरह मानते थे.. मुहर्रम शुरू होते ही मेरी दादी की छोटी छोटी परम्पराएं शुरू हो जाती थीं.. बालों में तेल न लगना.. चटख रंग के कपडे से परहेज़.. वग़ैरह.. मरसिया भी पढ़ती थीं और ख़ुद ही अकेले रो भी लेती थीं.. दादा अपनी रोज़ा नमाज़ में वयस्त रहते और कभी दादी को किसी भी चीज़ के लिए मना नहीं किया।

loading...

दादी का इस्लाम मुझे ज़्यादा आकर्षित करता था क्यूंकि उसमे सबके लिए जगह थी.. बसंत में पीले कपड़े भी होते थे और सावन में धार्मिक कर्मकांड की तरह पेड़ में झूला पड़ता था.. दिवाली पर मेरे लिए पूरे गाजे बाजे के साथ घरौंदा बनता था जिसमे लगभग पूरी दिवाली रोज़ शाम दिए जलते थे.. पड़ोस की औरतें दिवाली की रात गाती बजाती आती थीं और मेरे घरौंदे के सामने रंगोली बनाती थीं.. दादी उन सबके साथ उनके गाने में शामिल होती थीं.. मेरे घरौंदे का दिया दादी बुझने न देती थीं।

दादी का इस्लाम आसपड़ोस को समेट के चलता था.. अपने देश की सारी छोटी बड़ी परंपराओं को मानते हुवे.. दादा का इस्लाम सिर्फ अल्लाह, मस्जिद और ख़ुद तक सिमटा हुवा था.. वो बोरिंग कांसेप्ट था इस्लाम का.. न ख़ुद का कोई उत्सव न दूसरे का।

दादी के मायके वाले (पूरा गांव) अभी भी मुहर्रम की सारी परंपराओं को निभाते हैं.. मगर जब से कुछ लोग सऊदी कमाने गए और यहाँ वापस आये तब से उन्हें अब पुरखों की उन्ही परंपराओं में शिर्क़ और बिद्दत दिखने लगी है.. ताज़िया मूर्ति पूजा दिखने लगी है.. वैसे अभी इन नए नए वहाबियों की वहां चलती नहीं है मगर फिर भी आने वाले समय में मुझे दिख रहा है कि उनकी पीढियां अपनी परंपराओं से दूर हो जाएंगी और सऊदी से लाये हुवे उनके इस्लाम को अपना लेंगी।

मेरी सोच आज जो भी है मेरी दादी की देन है.. जितनी भी इंसानियत की शिक्षा मेरे भीतर है वो सब उन्ही की दी हुई है.. क़ुरान की ही कहानियों से मेरी दादी ने मुझे ये सब सिखाया था.. वो बताती थीं कि कैसे अबाबीलों के झुंड ने काबा को बचाया और कहती थीं कि सभी चिड़ियां अबाबील की रिश्तेदार हैं इसलिए चिड़ियों के साथ हमेशा करुणा करना.. जो चिड़िया मारते हैं उनका खानदान तबाह हो जाता है और उनके बच्चे अपंग पैदा होते हैं।

दादा अन्त तक जन्नत के चक्कर में ही लगे रहे जबकि दादी ने ख़ूब जिया.. ख़ूब गाया बजाया.. और धर्म भी साथ साथ निभाया.. मेरी दादी और अल्लाह के बीच का रिश्ता मोहब्बत का था जबकि दादा का अल्लाह तानाशाह था जिस से वो डर डर कर जीते रहे.. दादी का इस्लाम सही मानों में हिंदुस्तानी इस्लाम था.. सऊदी से वापस आने वाले रंगरूटों के लिए भले ही ये शिर्क़ और बिद्दत हो मगर हमे इस शिर्क़ और बिद्दत वाले इस्लाम को बचाना है किसी तरह वरना जो मज़ा मैंने लिया है इस्लाम का वो शायद आने वाली पीढ़ियों के लिए ख्याल और ख़्वाब हो जाय।

अगले पृष्ठ पर जाएँ

loading...