ब्लॉग : राजनीतिक हो गये मुद्दों पर लिखना अब घिन्नात्मक लगता है, बावजूद आज लिखते है…

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ब्लॉग: सुभाष सिंह सुमन (यूनाइटेड हिन्दी) – मंगलवार को ओआरओपी की मांग को लेकर एक पूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल ने कथित तौर पर कोई जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली थी। उनकी आत्महत्या के बाद भारतीय गंदी राजनीति तेज हो गई है।  पुलिस सूत्रों के हवाले से जो ख़बर आ रही है उसके मुताबिक 31 अक्टूबर को ग्रेवाल ने दो दोस्तों से पेंशन पर बातचीत की। भिवानी के नेहरू पार्क में दोस्तों से बात हुई। फिर एक NGO वाले राजकुमार ने कहा इसके लिए दिल्ली चलो। वहां सुमित्रा महाजन से मिलते हैं वे मदद करेंगी।  इसके बाद 31 अक्टूबर की रात राम किशन, राजकुमार, पृथी सिंह और जगदीश राय ट्रेन से दिल्ली के लिए निकले। कुल 4 लोग साथ में थे। सबसे पहले रामकिशन जंतर मंतर गया था। उसके बाद तीन मूर्ति होते हुए सुमित्रा महाजन की कोठी के सामने से गुजरे। चुंकि कोठी के दोनों गेट बंद थे तो सभी लोग वहां से जनपथ होते हुए राजपथ के पास जवाहर भवन के पास एक पार्क में जाकर बैठ गए। उसके बाद जगदीश राय खाना लेने चला गया। राजकुमार मोबाइल में कुछ काम करने लगा। पृथी सिंह लेट गया और राम किशन किसी से फोन पर बात कर रहा था और बोल रहा था कुछ और एक्स सैनिकों को फोन करना है बुलाने के लिए।

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उसके बाद अचानक राजकुमार को कुछ बदबू आई। तब उसने देखा की राम किशन ने कुछ खाया। कुछ गोलियां उसने गिरा भी दीं। उसके बाद 1 बजकर 35 मिनट पर 100 नंबर पर कॉल की गई।  अभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट की शुरुआती जांच में आया है कि किसी  पॉयजन खाने की वजह से मौत हुई है। बाकी पूरी पीएम रिपोर्ट आने के बाद साफ़ हो पाएगा।

राम किशन के पास रिकॉर्डिंग का फोन नहीं था। उसके बेटे जसवंत के पास रिकॉर्डिंग का फोन था जिसमें राम किशन और जसवन्त की बात रिकॉर्ड हुई। अभी पुलिस राम किशन के फोन की सीडीआर निकलवा रही है। अभी पुलिस ये पता लगा रही है कि वो पॉयजन क्या था। राम किशन के पास कैसे आया। क्या दिल्ली में खरीदा, या भिवानी से लेकर आया था!

आइये अब चलते है सुभाष सिंह सुमन के ब्लॉग पर सुभाष बाबू लिखते है – पता नहीं क्यों यह चर्चा का विषय हो जाता है। अफ़सोस कि आज इसपर लिखना पड़ रहा है। हालाँकि, समसामयिक, विशेष कर राजनीतिक हो गये मुद्दों पर लिखना अब घिन्नात्मक लगता है, बावजूद आज लिखते हैं। पूरा पढ़ने पर अप्रासंगिक तो कतई नहीं लगेगा आपको।

दरअसल, आत्महत्या पूरी सृष्टि के साथ किया गया धोखा है। एक जीवन मिला है और उसका भी दम स्वयं घोंट देना घृणित है। इंसान भावुकता कम, कायरता अधिक के चरम पर पहुँचकर यह हरकत करता है।

मेरे ग्रेजुएशन के दिनों की बात है। द्वितीय वर्ष, विषय था एक वैकल्पिक ‘सिटिजनशिप इन ग्लोबलाइजिंग वर्ल्ड’। प्रोफेसर शानदार हैं वह, जिन्होंने यह पढ़ाया था हमें। तो एकदिन उनका लेक्चर चल रहा था। हमारे साथ का एक बालक बीच क्लास डेस्क पर सिर टिकाकर मस्त सो रहा था। सर की नज़र गयी। सर ने जगाया उसको। जवाबतलबी हुई कि क्या पढ़ाया जा रहा था, स्वाभाविकतः कोई जवाब आया नहीं। आगे सर आक्रोशित हुए, जो वह चुनिंदा ही हुआ करते हैं।

बकौल प्रोफेसर, केंद्रीय विश्वविद्यालय के हर एक विद्यार्थी पर भारत सरकार प्रति माह दस-बीस लाख रुपये खर्चती है। विद्यार्थी फीस भरता है अधिकतम पन्द्रह हजार प्रति वर्ष। बाकी के पैसे आये कहाँ से? सरकार ने अपने घर से तो नहीं ही दिया है। सब जनता का पैसा है। एक अरब बीस करोड़ से भी अधिक लोगों का पैसा।

हर वह इंसान जो महज़ नमक भी खरीदता हो, हमारे ऊपर खर्च किया है उसने। यही बात हमें तमाम लोगों के लिये उत्तरदायी बनाती हैं। हम अपनी नियति स्वयं तय करने के अधिकारी नहीं। गलतियाँ यदि करेंगे, उसे ठीक भी करना होगा। निजी परेशानियों का हवाला देकर कोई भी सामाजिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। चाहे वह कोई आत्महंता हो या फिर हिमालय की कंदरा में जा बैठ गया कोई कथित आध्यात्मिक।

इससे परे चलिये अध्यात्म पर ही। हर किसी जीव की अपनी अहमियत है। भूगोल का बटरफ्लाय थ्योरम कहता है कि विश्व के किसी हिस्से में आयी भीषण प्राकृतिक आपदा का कारण किसी सुदूर हिस्से में एक तितली का पंख फड़फड़ाना भर हो सकता है। मने साफ है कि उस तितली की खूब अहमियत है। वह खुद को मारने की अधिकारी नहीं है। हम इंसान तो कथित तौर पर ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति हैं। हैं, क्योंकि हम सोच-समझ सकते हैं। यदि यह सच है फिर इंसानों की आत्महत्या या हिमालयी पलायन कतई सराहना को योग्य नहीं। बंद करिये आत्महात्याओं का महिमामंडन। आपका यह महिमामंडन, भविष्य में और आत्महत्याओं का उत्प्रेरक हो सकता है।

शेष यह कि कभी हम भी हुए थे आत्मघाती। तीन बार कोशिश किये रहे। ये तीन कारण पर्याप्त हैं कि हम खुद ही खुद को तमाम मौकों पर लताड़ लिया करते हैं। यदि इसी तरह महिमामंडन जारी रहा, तो तमाम वे लोग जो सुभाष नहीं हैं, मर सकते हैं असमय। भले ही वह अपनी क्षमता और उत्पादकता से परिचित नहीं हों। हमहीं चार साल पहले टपक लिये होते तो तमाम लोगों को विविध उत्पादक चीज़ें न मिल पातीं। यदि मिलती भी, तो बहुत देर से।

(लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया unitedhindiweb@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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