सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस पर विशेष, धर्म और देश के लिये जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है…

हिन्दू माता के एक महान पुत्र का पुण्य-स्मरण उनके अवतरण दिवस पर

ब्लॉग : अभिजीत सिंह ( यूनाइटेड हिन्दी ) :-  भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन हिन्दू पुनरुत्थान का आन्दोलन भी था क्योंकि इस रण के जो भी सच्चे नायक थे उन सबकी आस्था और मान्यता यही थी कि हिन्दू आदर्श, हिन्दू दर्शन, हिन्दू जीवन-परंपरा, हिन्दू जीवन-मूल्य, हिन्दू तत्व-दर्शन और हिन्दू शासन-व्यवस्था को अंगीकार किया जाना और उसके संरक्षण पर बल देना ही भारत के स्थायी स्वाधीनता की गारंटी है। इसलिये वो चाहे जहाँ भी रहे इस जीवन-प्रवाह के साथ न केवल उनका सतत संबंध बना रहा बल्कि उनको जब भी मौका मिला इस शाश्वत मूल्य को प्रतिस्थापित करने के लिये वो कृतसंकल्पित भी रहे।

प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस भारत से निकलने के बाद आठ साल जापान में अज्ञातवास में रहे, इस दौरान जापानी कन्या से विवाह भी किया और उनसे संतान प्राप्ति भी हुई, जापान सरकार और जापानी जनता का असीम स्नेह भी उन्हें प्राप्त था पर इन सबके बाबजूद उनके अन्तस्थ: में हिंदुत्व की ज्वाला कभी भी धूमिल नहीं हुई। जब जीवन की अंतिम संध्या आई तो रासू दा ने दो ही चीज़ माँगी थी, एक था तुलसी दल और दूसरी थी रुद्राक्ष की माला। जाने से पहले अपना विरासत उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया। सुभाष अधिकांश समय भारत से बाहर ही रहे पर उन्हें राम और रामायण विस्मृत नहीं हुए, गंगा उनसे दूर नहीं हुई, गोदावरी की कल-कल धारा उनके कानों में गूंजती रही। एक बार अपने रिश्तेदार को लिखे पत्र में उन्होंने स्वतंत्र भारत देश की अपना परिकल्पना बताते हुए लिखा था…

“अपना ये भारतवर्ष भगवान का बड़ा प्रिय स्थान रहा है। यहाँ भगवान ने अवतार लेकर पाप से बोझिल धरती का उद्धार किया और यहाँ के लोगों के हृदय में सत्य और धर्म को स्थापित किया। दक्षिण में स्वच्छ जल से परिपूर्ण पवित्र गोदावरी दोनों किनारों का स्पर्श करती है और कल-कल ध्वनि के साथ सागर की ओर निरंतर भागती जाती है। कैसी विचित्र है वह. उसे स्मरण करते ही रामायण की पंचवटी याद आ जाती है फिर स्मरण आतें हैं राम, लक्ष्मण और सीता जो समस्त राज्य और संपदाओं का परित्याग कर स्वर्गिक सुख की अनुभूति करते हुये गोदावरी के तट पर समय व्यतीत कर रहें हैं।”

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आगे अपने पत्र में सुभाष पवित्र जाहनवी का, ऋषि वाल्मीकि की तपः-स्थली का, लव और कुश का तथा पावन भारत के वातावरण में गूँज रहे वेद-मन्त्रों का स्मरण करतें हैं। भारत वर्ष से लुप्त हो गये उन मंत्रोच्चारों को सुभाष याद करने के बाद सुभाष की आँखों में यज्ञ करने के लिये हवन-सामग्री इकठ्ठा करते ऋषि कुमार घुमने लगतें हैं वो खुद से पूछ्तें हैं, कहाँ हैं उन ऋषिकुमारों के पवित्र मंत्रोच्चार और कहाँ हैं उनके यज्ञ-पूजनादि ?

यानि स्वाधीन भारत का ये चित्र था सुभाष की आँखों में, वेद-कालीन भारत का…..

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