तो क्या बाबा रामदेव लाएं पतंजलि हर्बल स्याही, ताकि नेताजी को खुजली न हो!

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स्याही क्या है? रंग ही तो है. होली में सभी एक-दूसरे के ऊपर फेंकते ही हैं। प्यार से रंग फेंकना सही है फिर विरोध में फेंकना गलत क्यों? स्याही से अगर कपड़े गंदे हो रहे हैं, तो नेताजी को साबुन दिलवा दो। अगर खुजली होती है, तो खुजली की दवा दिलवा दो।
स्याही क्या है? रंग ही तो है. होली में सभी एक-दूसरे के ऊपर फेंकते ही हैं। प्यार से रंग फेंकना सही है फिर विरोध में फेंकना गलत क्यों? स्याही से अगर कपड़े गंदे हो रहे हैं, तो नेताजी को साबुन दिलवा दो। अगर खुजली होती है, तो खुजली की दवा दिलवा दो।

अभिरंजन कुमार : इस देश में अगर राष्ट्रविरोधी कार्यक्रम आयोजित करने वालों अथवा उन्हें समर्थन देने वालों को भी पुलिस गिरफ़्तार कर ले, तो बड़ी संख्या में लोग सरकार और पुलिस का विरोध करने लगते हैं। अगर किसी बड़ी आतंकवादी घटना के बाद जांच एजेंसियों को किसी पर शक हो जाए और वह उसे गिरफ्तार कर ले, तो भी अक्सर लोग बवाल काटना शुरू कर देते हैं। लेकिन फिनलैंड-प्रेमी किसी नेताजी पर अगर कोई स्याही मात्र भी फेंक दे, तो उसे फौरन गिरफ्तार कर लिया जाता है। कोई इसकी आलोचना तक नही करता!

हालांकि फिलहाल मैं अच्छे-बुरे किसी भी नेताजी पर स्याही फेंके जाने का समर्थन नहीं कर रहा। लेकिन स्याही फेंकने वाले की बात सुनें और समझे बिना उसकी गिरफ़्तारी की आलोचना ज़रूर करता हूं। अगर स्याही फेंकने वाले की मंशा बुरी नहीं है तो कपड़े गंदे होने की स्थिति में नेताजी को मुआवजे में साबुन के पैसे दिलवाए जा सकते हैं। और अगर स्याही से नेताजी को खुजली हो जाती है, तो उन्हें खुजली की दवा भी दिलवाई जा सकती है। लेकिन गिरफ़्तारी तो कुछ ज़्यादा ही सख्त कदम है।

दरअसल, राजनीति में कई बार ऐसा भी होता है कि चर्चा में आने के लिए या किसी मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए या विरोधियों को बदनाम करने के लिए अलग किस्म की राजनीति करने वाले लोग ख़ुद ही अपने ऊपर जूते-चप्पल चलवा लेते हैं या स्याही फिंकवा लेते हैं। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी स्याही फेंकने वाले की नहीं, बल्कि अपने ऊपर फिंकवाने वाले की होनी चाहिए।

सवाल है कि अगर कोई नागरिक राज्य में डेंगू, चिकनगुनिया आदि फैले होने और उसकी रोकथाम के उचित इंतज़ाम न किये जाने से सरकार के किसी फिनलैंड-प्रेमी नेताजी से नाराज़ हो, तो उसके विरोध को ग़लत कैसे कहा जा सकता है? हां, विरोध के तरीके पर चर्चा ज़रूर की जा सकती है। आख़िर, जनता जिसे कसूरवार मानती है, उसे उसकी ग़लतियों का अहसास कैसे कराए?

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