ब्लॉग : अजय की फिल्म ”शिवाय” हर भारतीय को क्यों देखनी चाहिए? जानिए प्रमाणिक हस्ताक्षर….

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ब्लॉग : डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी (यूनाइटेड हिन्दी) – अभी एक चलचित्र प्रदर्शित हुआ है ”शिवाय” अजयदेवगन द्वारा अभिनीत एवं निर्देशित इस चलचित्र में पिता एवं पुत्री के वात्सल्य का अच्छे से चित्रांकित किया गया है। तथापि इस चित्र के कथानक का आधार यूरोप में होने वाले बालयोनाचार एवं विश्वभर से होने वाले बाल अपहरण का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख देते है।

shivaay


लगभग डेढ वर्ष पूर्व मैंने यूरोप में मानव व्यापार एवं आदि विषयों पर कुछ लेख वैदेशिकों से ही प्राप्त वेबसाईटों के आधार पर लिखे थे। और सयोंगवश इस चलचित्र के निर्देशक ने इसी विषय को आधार बनाया है कि किस प्रकार यूरोप पूरा ही बालयोनाचार एवं मानवीय अंगों के व्यापार जैसे कुत्सित एवं अत्यधिक घृणित अमानवीय कुकृत्य में लिप्त है।

अब देखिये भारत जैसे देश में भ्रष्टाचार एक विषय है जिस पर हम भारतीयों की बुराई करते हैं। हमें पिछड़ा हुआ कहा जाता है कि एक व्यक्ति 50-100 रूपये लेकर ही अपना कार्य पूरा करता है जबकि उसको उसका वेतन मिलता है। परन्तु मैं कहता हूँ कि वह अपने बच्चों अथवा उनके मित्रों के शरीर का सौदा तो नहीं करता! यूरोप में नर माँस भोजन का बहुत बड़ा व्यापार चलता है। चलचित्र में यह भी बताया है कि बालकों के अपहरण का यह व्यापार खरबों डालरों का है अत: यूरोप के कई देश बहुत गहराई से इस अधोगति में पहुँचाने वाले व्यापार में संलिप्त हैं। धिक्कार है। और इसमें कुछ एनजीओ ही सम्मिलित हैं जो विश्व प्रसिद्ध एवं बहुत बड़ें हैं एवं अपने पीछे ऐसा कुत्सित कार्य करते हैं। विदेशों में अधिकतर अनाथाश्रमों से ही ये व्यापार संचालित होता है। जो परम्परा इनके प्राचीन दार्शनिकों के समय से अद्यावधि पर्यन्त प्रचलित है। यूरोप के बालसंरक्षण संस्थाओं के आँकड़ों के अनुसार यूरोप के पाँच में से एक बालक के साथ योनाचार जैसी दुर्घटना हो चुकी होती है।

यदि श्रीराम गोयल की पुस्तक प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास पढ़ें तो ज्ञात होगा कि भारत से बाहर जहाँ इन मानव रूपधारी पशु सभ्यता का विकास हुआ वहाँ बालकों के साथ अमानवीय कुकृत्य प्राचीनकाल से ही होते रहे हैं। इनके दार्शनिकों के भी शारीरिक वासना सम्बन्धि विचार कोई आदर्श मानक पर आधारित नहीं हैं। तो सामान्य जन की क्या अवस्था होगी हम सभी सोच सकते हैं। वहाँ की संस्कृति ही ऐसी है। एवं वहाँ हमें जो सफाई, चमक—दमक, सुन्दरता, गोरी चमड़ी का आकर्षण आदि दिखाई देता है। इन सभी के पीछे एक पैशाचिक हृदय छिपा हुआ।

यही संस्कृति अब भारत में भी प्रचारित की जा रही है। और सबसे दु:खद है कि भारत में भी अप्राकृतिक व्यभिचार को एक व्यवस्थित षडयन्त्र के द्वारा फैलाया जा रहा है। आप अपने आसपास के किशोरों का देखिये किस प्रकार उनमें एक प्रकार का क्रोध भरता जा रहा है। एवं ये उन्हीं किशोरों में अधिक है जो एक विशेष प्रकार के विद्यालयों में पढ़ते हैं। जिनके माता-पिता ने उन्हें ये सोच कर उन विद्यालयों में डाला हैकि आने वाले समय में हमारा बच्चा पिछड़ न जाय। किन्तु उनके बच्चे वहाँ यौन कुण्ठित बनाए जा रहे हैं।

सभी से निवेदन है कि इस चलचित्र को अवश्य देखें। यह एक ऐसा अपराध है जो मानवजाति को पूरा ही काला कर रहा है।

(लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया unitedhindiweb@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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