मुस्लिम आतंकी एनकाउंटर पर झूठ का चेहरा बनाई जा रहीं है ये महिलाएं…

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यूनाइटेड हिन्दी – मध्यप्रदेस राज्य के भोपाल शहर की सेंट्रल जेल के खूंखार मुस्लिम आतंकियों के एनकाउंटर का मुद्दा इस वक़्त पूरे राष्ट्र में ज़बर्दस्त चर्चा पर है। एक तरफ़ ISO प्रमाणित भोपाल सेंट्रल जेल से मुस्लिम संगठन सिमी के 8 आतंकियों के फ़रार होने के दावे पर सवाल उठाया जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ़ एनकाउंटर के तरीक़े पर चर्चा हो रही है। लेकिन कई लोगों को इस तरह सवाल करना पसंद नहीं आ रहा। उनके हिसाब से मुस्लिम संगठन सिमी के आतंकवादियों के एनकाउंटर पर सवाल भी नहीं उठाया जाना चाहिए!

लेकिन यहाँ बात यहीं ख़त्म नहीं होती। सवाल करनेवालों के ख़िलाफ़ इन लोगों का ग़ुस्सा सोशल मीडिया पर मानो एक तूफान की शक्ल ले रहा है। इस सारी गहमागहमी के बीच हाथ में पोस्टर लिए खड़ी एक लड़की की तस्वीर सोसियल मीडिया पर ज़बर्दस्त शेयर की जा रही है। इस लड़की के हाथ में पकड़े पोस्टर पर जो कुछ लिखा है, लोग उसे उस लड़की का विचार समझकर ही शेयर करते जा हैं। पोस्टर पर क्या लिखा है, ज़रा आप खुद देखिए…..

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लड़की के हाथ में पकड़े पोस्टर पर एडिट करके लिखा है, ‘जिन सेक्युलर कुत्तों को कुछ आतंकियों के मरने का मलाल हो रहा है। अभी उनको चिंता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उनकी बेटी से शादी करने के लिए अभी बहुत आतंकवादी ज़िन्दा हैं।’ आप यहाँ क्लिक करके यह पोस्ट देख सकते हैं।

यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम की टीम द्वारा इस पोस्ट के  झूठ को पकड़ना काफ़ी आसान रहा! जो लोग फिचले काफ़ी दिनों से सोसियल मीडिया पर हैं और इस तरह के पोस्ट्स से परिचित हैं, वे भी आसानी से इस एडिट किये हुये या फर्जी तरीके से लिखे को पकड़ लेंगे। लेकिन हमने इसका सच आप तक पहुँचाने का फ़ैसला इसलिए भी किया क्योंकि इस झूठ के ज़रिए महिलाओं के लिए दिए गए एक अच्छे संदेश को छुपाकर समाज को भड़काने का काम तो किया ही जा रहा है साथ ही उस व्यक्ति को भी इस साज़िश में शामिल किया जा रहा है जिसका इससे कोई लेना-देना नहीं है। भला इस बच्ची की इस पूरे विवाद में क्या ग़लती है? देखिए इस बच्ची की असली फोटो क्या कह रही है, असली पोस्ट के साथ…..

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इस वर्ष देव उठनी एकादसी से शुरुआत में भारत में होने वाली शादियों पर रूढ़िवादी परंपराओं को लेकर सोशल मीडिया पर एक #SochBadlo (सोच बदलो) नाम से अभियान चलाया गया था। इस अभियान में कई लड़कियों ने अपने विचार पोस्टर के मध्याम से समाज में व्यक्त किए थे। जो असली तस्वीर आप देख रहे हैं, वह इसी अभियान का एक हिस्सा है। इस तस्वीर में दिख रहे पोस्टर पर साफ लिखा है, ‘मेरे पिता ने सारी ज़िन्दगी टू वीलर चलाया है, वह मेरी शादी के लिए कार कैसे ख़रीदेंगे।’ ज़ाहिर है ये पोस्टर दहेज प्रथा का विरोध करता है। इस सही सोच को भोपाल मुस्लिम आतंकवादी एनकाउंटर से जोड़ने वालों ने भारतीय समाज को तो भटकाया ही है, साथ ही एक सही संदेश की भी हत्या की है।

लेकिन क्या ऐसा केवल एक सरकार या एक विशेष विचारधारा के लोग ही करते हैं? नहीं, ऐसा नहीं है! भारत तो है ही ‘विविधताओं वाला देश’। यहाँ देखिए, कैसे सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधी भी ठीक इसी तरह का झूठ का प्रचार फैलाते हैं।

 

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यह पोस्ट कल (2 नवंबर, 2016) को ही डाला गया है और इसकी प्रतिक्रीया भी देखिए। झूठ के पुलिंदे से बनाई गई इस एडिट तस्वीर को शेयर करना ही देशहित या देशभक्ति बताया गया है। क्या केवल किसी व्यक्ति या किसी पद पर आना या जाना ही देशहित कैसे हो सकता है?

देशहित तो इस बात से जुड़ा है कि सड़क पर चलने वाले व्यक्ति से लेकर प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति तक हम सब इस राष्ट्र के लिए क्या कर रहे हैं। केवल किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करने के लिए झूठ फैलाने को देशहित बताना देशहित तो नहीं, हाँ नैतिक अपराध ज़रूर है। ऊपर जो सच हमने आपको बताया यह सच भी बिल्कुल वैसा ही है। देखें,,,,,

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#SochBadlo अभियान की तरह स्पीकिंग फ्रेम्स नाम के फेसबुक अकाउंट से डाली गई यह तस्वीर भी महिलाओं की समस्याओं पर बात करती नजर आई है। यह कहती है, ‘आप एक पुरुष हैं, इसका मतलब यह नहीं कि आप किसी भी महिला से बेहतर हैं। पुरुषवादी होना बंद करिए।’ इस अकाउंट पर जाइए, आपको और भी तस्वीरें मिल जाएंगी। क्या पता, उन्हें भी कहीं कुछ लोग अपने अजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रहे हों।

अपने मतलब के लिए महिलाओं के संदेश को बदलना और उनके चेहरे इस्तेमाल करना घोर निंदनीय व कानूनी अपराध भी है। फिर चाहे आप कितने ही देशभक्त या सेक्युलर क्यों ना हों!

ये दोनों झूठ भोपाल के मुस्लिम आतंकवादी एनकाउंटर की घटना के बाद सोसियल मीडिया पर फैलाए जा रहे हैं। क्या किसी घटना पर सवाल करना अपराध है? सवाल करने वाले व्यक्तियों का इस तरह विरोध करना जायज़ है? क्या देश में इतनी नफ़रत सही है? लोग क्यों भड़क रहे हैं? जो लोग एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं, क्या वे यह कह रहे हैं कि आतंकवादी निर्दोष थे? क्या वे उन्हें रिहा करने की बात कर रहे हैं? जो दोषी है उसे सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन जो क़ानून के द्वारा दोषी नहीं माना गया है, उसे अपनी भावना के आधार पर ही दोषी मान लेना और उसके मारे जाने को सही बताना क्यों सही है?

हमारा तो बस इतना ही कहना है, कि वैचारिक रूप से कमज़ोर लोग ही ऐसा ही सोचते हैं और इसीलिए सफ़ेद फर्जी झूठ का सहारा लेते हैं।

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