“बबुआ आप कौन जात के है?” ये भूमिहार ब्राह्मण कौन नई जात है?

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ब्लॉग – महावीर प्रसाद (यूनाइटेड हिन्दी) : हमारे देश आर्यावर्त मे हज़ारों विक्रम सम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध राजा सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओ के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्मऋषि भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हे अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन या भूमिहार कहा जाने लगा।

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जोकि कालान्तर में त्यागी, भूमिहार, महियाल, पुष्करणा, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे।

त्यागी अर्थात भूमिहार आदि ब्रह्मऋषि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल में भूमिहार, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में, गालव गुजरात में, अनाविल महाराष्ट्र में, चितपावन एवं कार्वे कर्नाटक में, अयंगर एवं हेगडे केरल में, नम्बूदरीपाद तमिलनाडु में, अयंगर एवं अय्यर आंध्र प्रदेश में, नियोगी एवं राव तथा दास एवं मिश्र उड़ीसा में आदि उपनामों से जाना जाता है।

अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

भूमिहार या ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवंझारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है।

भूमिहार ब्राह्मण समाज में कुल 10 उपाधिय है-
1- पाण्डेय, 2- तिवारी/त्रिपाठी, 3- मिश्र, 4- शुक्ल
5- यजी, 6- करजी 7- उपाध्याय, 8- शर्मा
9- ओझा, 10-दुबे\द्विवेदी

इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारण एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय, शाही, सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही, सिंह (सिन्हा), चौधरी, ठाकुर आदि बिहार में लिखने लगा बहुत से भूमिहार या बाभन/बामन भी लिखते है..!!

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है। प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, पुष्करणा, महियल, सरयूपारीण, मैथिल (झा), चितपावन, कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए, मगध के ब्राह्मण और मिथिलांचल के पश्चिम तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार गाँव में ही सम्मिलित होते गए…!

भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों (कूरी) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण रूप में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है :
1. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार, सकरवार, किन्वार, ततिहा, ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि…..

  1. सरयूपारी शाखा से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी, पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र, राजस्थान आदि पश्चिमोत्तर क्षेत्र के पुष्करणा – पुष्टिकरणा – पुष्टिकर ब्राह्मण आदि.. !!

  2. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं। इनमे स्वर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर प्रमुख है।

  3. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए। एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर, आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए।

  4. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे। अयाचक ब्राह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए। पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा, भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका, भोजपुर, रोहतास के कई गाँव में ये चितपावन मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं.!

  5. पुष्करणा / पुष्टिकर से : सिंध, बलोचिस्तान, अविभाजित पंजाब, राजस्थान और गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र में बसने वाले अयाचक ब्राह्मण समूह पुष्करणा ब्राह्मण भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समुदाय ही हैं।

भारतीय इतिहास में सिंध – थार के साम्राज्य पर मोहम्मद बिन कासिम के अरब मुस्लिम आक्रमण से पहले का आखिरी ब्राह्मण सम्राट “राजा दाहिरसेन” पुष्करणा ब्राह्मण ही था, पुष्करणा ब्राह्मण शुरूआत से ही कृषि – व्यापार – अध्यापन – ज्योतिष विज्ञान – धर्म शास्त्र व ग्रंथ टीका रचनाओं – सैन्य कार्य – प्रशासन – जमींदारी – दीवानी आदि से जुडे कार्य करते हुऐ भूमिहार रहे हैं। पुष्करणा ब्राह्मण पुरोहिती – कर्मकांड / याचक द्वारा जीवन यापन नहीं करते रहे हैं।

भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था.. याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं, फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा। काफी विचार विमर्श के बाद ”भूमिहार ब्राह्मण” शब्द अस्तित्व में आया।

मैं महावीर प्रसाद खिलेरी व्यास, पुष्करणा/पुष्टिकरणा/पुष्टिकर ब्राह्मण हूँ, अर्थात मैं ‘महावीर प्रसाद खिलेरी’, पुष्करणा भूमिहार ब्राह्मण, भारद्वाज गोत्री, यजुर्वेदी, टंकाशाली व्यास हूँ! मेरा पुष्करणा ब्राह्मण समाज भी प्राचीनतम भारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय है और पुष्करणा / पुष्टिकरणा ब्राह्मण समाज भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समाज है।

व्यास अथवा वेदव्यास हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान नारायण के ही कलावतार थे। व्यास जी के पिता का नाम पराशर ऋषि तथा माता का नाम सत्यवती था। जन्म लेते ही इन्होंने अपने पिता-माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारम्भ में इनकी माता सत्यवती ने इन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु अन्त में इनके माता के स्मरण करते ही लौट आने का वचन देने पर उन्होंने इनको वन जाने की आज्ञा दे दी। प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया। पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य , चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए। इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए। समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से चार शिष्यों को चार वेद पढ़ाये- मुनि पैल को ॠग्वेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद, जैमिनि को सामवेद तथा सुमंतु को अथर्ववेद पढ़ाया।

व्यास का अर्थ : व्यास का अर्थ है ‘संपादक’। यह उपाधि अनेक पुराने ग्रन्थकारों को प्रदान की गयी है, किन्तु विशेषकर वेदव्यास उपाधि वेदों को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले उन महर्षि को दी गयी है जो चिरंजीव होने के कारण ‘आश्वत’ कहलाते हैं। यही नाम महाभारत के संकलनकर्ता, वेदान्तदर्शन के स्थापनकर्ता तथा पुराणों के व्यवस्थापक को भी दिया गया है। ये सभी व्यक्ति वेदव्यास कहे गये है। विद्वानों में इस बात पर मतभेद है कि ये सभी एक ही व्यक्ति थे अथवा विभिन्न। भारतीय परम्परा इन सबको एक ही व्यक्ति मानती है। महाभारतकार व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे, ये साँवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अतएव ये साँवले रंग के कारण ‘कृष्ण’ तथा जन्मस्थान के कारण ‘द्वैपायन’ कहलाये। इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किये जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाये, इनमें तीसरे विदुर भी थे। पुराणों में अठारह व्यासों का उल्लेख है जो ब्रह्मा या विष्णु के अवतार कहलाते हैं एवं पृथ्वी पर विभिन्न युगों में वेदों की व्याख्या व प्रचार करने के लिए अवतीर्ण होते हैं। शुद्धात्मा व्यास जी विपत्ति ग्रस्त पाण्डवों की समय-समय पर पूरी सहायता करते रहे। इन्होंने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, जिससे संजय ने महाभारत का युद्ध प्रत्यक्ष लाइव टेलिकास्ट देखने के साथ-साथ श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से नि:सृत श्रीमद्भगवद् गीता का भी श्रवण किया। महर्षि व्यास की शक्ति अलौकिक थी।

एक बार जब ये वन में धृतराष्ट्र और गान्धारी से मिलने गये, तब सपरिवार युधिष्टिर भी वहाँ उपस्थित थे। धृतराष्ट्र पुत्र शोक से अत्यन्त व्याकुल थे। उन्होंने श्रीव्यास जी से अपने मरे हुए कुटुम्बियों और स्वजनों को देखने की इच्छा प्रकट की। महर्षि व्यास के आदेशानुसार धृतराष्ट्र आदि गंगातट पर पहुँचे। व्यास जी ने गंगा जल में प्रवेश किया और दिवंगत योद्धाओं को पुकारा। जल में युद्धकाल-जैसा कोलाहल सुनायी देने लगा। देखते-ही-देखते भीष्म और द्रोण के साथ दोनों पक्षों के योद्धा निकल आये। सबकी वेष-भूषा और वाहनादि पूर्ववत थे। सभी ईर्ष्या-द्वेष से शून्य और दिव्य देहधारी थे। वे सभी लोग रात्रि में अपने पूर्व सम्बन्धियों से मिले और सूर्योंदय से पूर्व भागीरथी गंगा में प्रवेश करके अपने दिव्य लोकों को चले गये। भगवान व्यास के इस चमत्कारिक प्रभाव को देखकर धृतराष्ट्र आदि आश्चर्यचकित रह गये।

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