बात पीएम मोदी ने चौराहे पर सजा देने की कही थी इसमें जूता कहां से आ गया ? – रवीश कुमार

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ब्लॉग : रविश कुमार – “भाइयों और बहनों, मैंने देश से सिर्फ 50 दिन मांगे हैं, 50 दिन. 30 दिसंबर तक मुझे मौका दीजिए, भाइयों-बहनों. अगर 30 दिसंबर की रात मेरी कोई कमी रह जाए, कोई मेरी गलती निकल जाए, कोई मेरा गलत इरादा निकल जाए, आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर देश जो सज़ा करेगा, वह सज़ा भुगतने के लिए तैयार हूं…”

प्रधानमंत्री के भाषण का यह टुकड़ा इसलिए शब्दश: लिख रहा हूं, क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर सियासी लोगों की ज़ुबान पर कहीं से जूता आ गया है। कई लोगों की टिप्पणी में देखा कि वे 50 दिन के बाद किसी चौराहे की सज़ा के लिए जूता मुकर्रर करना चाहते हैं। मुझे लगा, प्रधानमंत्री ने ही जूते का उल्लेख किया होगा, इसलिए उनके बयान को ठीक से सुनने लगा। आप भी देख सकते हैं कि उनके भाषण के इस टुकड़े में जूते का ज़िक्र नहीं है। फिर 50 दिन बाद चौराहे पर सज़ा देने के लिए न्यायिक उपकरण के रूप में जूते का ज़िक्र कैसे हो रहा है, वह भी प्रधानमंत्री के लिए।

अव्वल तो प्रधानमंत्री का यह बयान ही निहायत अलोकतांत्रिक है। वही चौराहे पर सज़ा की बात कर भीड़ की मानसिकता को संवैधानिक मान्यता देते नज़र आ रहे हैं। संभव है, उनके मन में विरोधियों के लिए ऐसी ही किसी सज़ा का ख़्याल आता हो, इसलिए अपने लिए भी ऐसी बात निकल गई हो। हमारी मानसिकता में वाक्य संरचना और शब्द कई बार छिपे रहते हैं, जिनका निर्माण समाज के सामंती तौर-तरीकों से होता रहता है।

जूता मारने का ख्याल ही जातिवादी ख़्याल है और यह मूलतः दलित विरोधी है। आप जूता मारने के मुहावरे और किस्सों की पड़ताल करेंगे तो पाएंगे कि जूता मारने का इस्तेमाल सिर्फ सवर्ण करता है। किसी दलित या कमज़ोर के ख़िलाफ़ करता है। नफ़रत की भाषा है जूता मारना। मैं नफ़रत की राजनीति के साथ-साथ नफ़रत की भाषा से भी नफ़रत करता हूं। मैंने भी एक बार मज़ाक में कह दिया कि जूते पड़ेंगे। बाकायदा आयोजक से निवेदन किया कि इसे हटा दें। यह अच्छा नहीं है। लेकिन कोई सचेत तरीके से बार-बार जूता मारने की बात लिख रहा हो, तो सतर्क करना ज़रूरी हो जाता है।

आगे पढ़िये और क्या लिखा रविश कुमार ने 

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