क्या राजस्थान में मुख्यमंत्री का सपना अब सिमट रहा है ?

प्रेमाराम सियाग : राजस्थान की राजनीति पिछले चार सालों में उमड़ते-घुमड़ते आज उस मुकाम पर आकर खड़ी हो गई है जहां सत्ता का फैसला एक छोटे से सही निर्णय से हो जायेगी तो दशकों के लिए सत्ता से दूर एक छोटी सी चूक पहुंचाकर खड़ी कर देगी।सत्ता से नाराजगी व विपक्ष से बेरुखी का ऐसा माहौल राजस्थान में पहली बार तैयार हुआ है।दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ़ राजस्थान की जनता पहली बार लामबंद हुई है। ऐसे मौके पर सबसे बड़ी किसान कौम जाट नेताओं के अनिर्णय के हालातों से जूझ रही है। जाट नेता अपने समर्थकों की भावना समझने में नाकाम हो रहे है तो समर्थक नेताओ के अनिर्णय से असमंझस के शिकार हो रहे है। ऐसी अवस्था मे मेरे मन मे तीन सवाल खड़े हो रहे है जो लगभग कांग्रेस-बीजेपी से छुटकारे की आस में घूम रहे समर्थक के मन मे भी है।

  1. जाट सीएम की लगातार मांग उठाकर जाटों की राजनैतिक चाहत को हवा देने वाले निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल अगर किरोड़ीलाल मीणा के साथ तीसरा विकल्प खड़ा करते है तो क्या जाट मुख्यमंत्री का सपना साकार हो पायेगा? क्या किरोड़ीलाल मीणा खुद सीएम बनना नहीं चाहेंगे! राजनीति में वरिष्ठता व अनुभव चुनाव के बाद जयपुर की होटलों में बैठकर सीएम की कुर्सी की तरफ सौदेबाजी का पहिया नहीं घुमाएगी? क्या किसान मुख्यमंत्री की बात करने के बजाय जाट मुख्यमंत्री की बात करना हमारे नेता की भूल थी?

2. घनश्याम तिवाड़ी-किरोड़ीलाल मीणा-हनुमान बेनीवाल का गठजोड़ क्या जाट मुख्यमंत्री का सपना साकार कर देंगे? क्या तिवाड़ी या मीणा अपनी वरिष्ठता त्यागकर जाट सीएम बनाने के लिए तैयार हो जाएंगे? क्या दो आरएसएस के स्वंयमसेवक एक जाट को मुख्यमंत्री बनाने में मददगार हो जाएंगे?

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3. तीसरा सवाल आम आदमी पार्टी से संबंधित है। अगर हनुमान बेनीवाल आम आदमी पार्टी जॉइन करते है तो क्या जाट मुख्यमंत्री का सपना साकार हो सकता है? क्या आम आदमी पार्टी में हनुमान बेनीवाल से वरिष्ठ व जनाधार वाला कोई नेता है? अगर सरकार बनाने की स्थिति में आम आदमी पार्टी पहुंचती है तो हनुमान बेनीवाल के खिलाफ राजस्थान में ताल ठोकने वाला कोई नेता होगा?

राजस्थान की राजनीति अभी इन सवालों का जवाब तलाश रही है। राजस्थान की बहुसंख्यक जनता इन्हीं सवालों में रास्ता ढूंढ रही है।राजनेता बिना विचारधारा खड़ी किये समय बर्बाद कर गए। निजी हितों के सरंक्षण के लिए जाट-मीणाओं को बहकाते रहे और आज हालात यहां तक पहुंच चूके है कि किरोड़ीलाल मीणा की खिलाफत मीणाओं में नरेश मीणा के साथ जुटी भारी भीड़ के रूप में प्रकट हो रही है।जाट समुदाय अभी तक संयमित रूप से नजारा देख रहा है। अगर हनुमान बेनीवाल ने जल्द निर्णय नहीं लिया या कांग्रेस-बीजेपी के साथ नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की तो राजस्थान की जाट राजनीति में भूचाल आ जायेगा। अपने नेताओं के खिलाफ ऐसा विद्रोह होगा जैसा पूरे देश के कौमी नेताओं ने अभी तक अपनी कौमों से नहीं झेला होगा।

बाकी अब तय कौम के जागरूक लोगों को मिलकर करना होगा। ऐकला चलो की राह के लिए रास्ते अब सुगम नहीं रहे। इन सवालों के जवाब हम सबको अपने अपने हिसाब से ढूंढ लेने चाहिए। अत्यधिक सब्र नाकामियों का बोझ बनकर खुद को ही दबा बैठेगा। आप सभी जागरूक बंधुओं की राय का इंतजार रहेगा।

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