क्या आप जानते हैं सम्राट पृथ्वीराज ने अपने प्राणों के बदले में गायों के प्राणो की रक्षा की थी ?

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मनीषा सिंह (यूनाइटेड हिन्दी) – सम्राट पृथ्वीराज चौहान को कायर कहने वालों पृथ्वीराज चौहान ने अपनी प्राण के बदले में गौ माता की प्राणो की रक्षा किया। तराइन का युद्धक्षेत्र पुन: दो सेनाओं की भयंकर भिड़ंत का साक्षी बन रहा था। भारत के भविष्य और भाग्य के लिए यह युद्ध बहुत ही महत्वपूर्ण होने जा रहा था।

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भारत अपने महान पराक्रमी सम्राट के नेतृत्व में धर्मयुद्ध कर रहा था, जबकि विदेशी आततायी सेना अपने सुल्तान के नेतृत्व मे भारत की अस्मिताको लूटने के लिए युद्ध कर रही थी। युद्ध प्रारंभ हो गया। ‘भगवा ध्वज’ की आन के लिए सनातनीयों ने विदेशी आक्रांता और उसकी सेना को गाजर, मूली की भांति काटना आरंभ कर दिया। ‘भगवा ध्वज’ जितना हवा में फहराता था उतना ही अपने हिंदू वीरों की बाजुएं शत्रुओं के लिए फड़क उठती थीं और उनकी तलवारें निरंतर शत्रु का काल बनती जा रही थीं। सायंकाल तक के युद्ध में ही स्थिति स्पष्ट होने लगी, विदेशी सेना युद्ध क्षेत्र से भागने को विवश हो गयी। उसे अपनी पराजय के पुराने अनुभव स्मरण हो आये और पराजय के भावों ने उसे घेर लिया।

इसलिए शत्रु सेना मैदान छोड़ देने में ही अपना हित देख रही थी। लाशों के लगे ढेर में मुस्लिम सेना के सैनिकों की अधिक संख्या देखकर शेष शत्रु सेना का मनोबल टूट गया और उसे लगा कि हिंदू इस बार भी खदेड़, खदेड़ कर मारेंगे। मौहम्मद गोरी को भी गोविंदराय की वीरता के पुराने अनुभव ने आकर घेर लिया था। इसलिए वह भी मैदान छोड़ऩे न छोड़ऩे के द्वंद में फंस गया था। हिंदू सेना के पराक्रमी प्रहार को देखकर उसका हृदय कांपता था। मौहम्मद गोरी ने चली नई चाल मौहम्मद गोरी ने जब देखा कि वह एक बार पुन: अपमान जनक पराजय का सामना करने जा रहा है तो उसने एक नई चाल चली। उसने हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को ऊंची आवाज में संबोधित कर उससे युद्ध बंद करने की प्रार्थना की। गोरी ने पृथ्वीराज चौहान से कहा कि अब मेरी आप से विनती है कि आप मुझे ससम्मान अपने देश जाने दें। बस, मैं इतना अवसर आपसे चाहता हूं कि मैंने अपने देश एक व्यक्ति को चिट्ठी लेकर भेजा है, वह उस चिट्ठी का उत्तर लिखा लाए तो मैं यहां से चला जाऊंगा। हम बार-बार कहते आये हैं कि भारत ने इन बर्बर विदेशी आक्रांताओं की युद्धशैली की घृणित और धोखे से भरी नीतियों को कभी समझा नहीं, क्योंकि भारत की युद्धनीति में ऐसे धोखों को कायरता माना जाता रहा है। शत्रु यदि प्राणदान मांग रहा है तो उसे प्राणदान देना क्षत्रिय धर्म माना गया है।

हिंदू सम्राट ने अपनी सेना को युद्धबंदी की आज्ञा दे दी। युद्धबंद होते ही गोरी की सेना को संभलने का अवसर मिल गया। जबकि सम्राट चौहान की सेना अपने शिविरों में जाकर शांति के साथ सो गयी। गोरी ऐसे ही अवसर की खोज में था कि जब हिंदू सेना शांति के साथ सो रही हो तो उसी समय उस पर आक्रमण कर दिया जाए। पी.एन.ओक लिखते हैं:-”ठीक आधी रात को जबकि हिंदू सेना बड़ी शांति से सो रही थी गोरी ने चुपचाप और एकाएक उस पर धावा बोल दिया। छल और कपट के मायाजाल में फंसे सोते वीर हिंदू सैनिकों को गोरी के कसाई दल ने हलाल कर दिया। इसी धोखे धड़ी के युद्ध में ही पृथ्वीराज चौहान ने भी वीरगति प्राप्त की।”

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