भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भयंकर Paralysis Attack हो गया है…

पिछले कई दिनों से बिहार और बंगाल से दंगों की खबरे आ रही हैं। इस दो राज्यों से मेरा जाती लगाव है। बंगाल मेरी जन्म और कर्म भूमि रही है बिहार मेरे माता पिता की जन्म भूमि है। जब से मैंने होश संभाला है इन दोनों राज्यों को अम्नो-शान्ति का गहवारा पाया है। ये सही है 1989 तक बिहार में दंगे आम थे, भला भागलपुर के दंगों को कौन भूल सकता है। लेकिन फिर लालू प्रसाद नामी एक शख्स ने बिहार में सरकार की ज़िम्मेदारी संभाली और उन्होंने बिहार को दंगामुक्त करने का निश्चय किया। लालू और राबड़ी देवी ने लगातार पंद्रह बरसों तक प्रदेश में राज किया और बिहार वाक़ई दंगामुक्त हो गया।

बिहार को हिन्दुओं और मुसलामानों के नाम पर बांटने की आज जो घिनौनी कोशिश हो रही है, यही कोशिश लालकृष्ण आडवाणी के रथ यात्रा द्वारा 1991 में भी की गयी थी। लेकिन इरादे की पक्की उस समय की राज्य सरकार ने तब आडवाणी को गिरफ्तार करने से भी नहीं घबराई थी। आज उसी पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगवाई में आडवाणी जैसे कई रहनुमा पैदा हो गए हैं। जो शख्स अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सबका साथ सबका विकास के दावे करते नहीं थकता, उसकी आवाज़ आज कहीं थम सी गयी है, लफ़्ज़ों का धनि ये नेता आज पता नहीं किस वजह से बोलना भूल गया है। और ये बात भारत के प्रजातंत्र केलिए बड़ा गंभीर संकेत दे रही है।

बिहार में दंगों का एक सुनियोजित ढंग से भड़कना जिस बात की और संकेत दे रहा है वो है हिंदुत्व पार्टियों का डर। सत्ताधारी पार्टी भजपा को आज ये डर बुरी तरह से सता रही है कि अगले साल होने वाले चुनाव में वो किस मुंह से विकास के नाम पर आपसे आप का वोट मांगेगी। दो करोड़ नौकरी का वादा करने वाले नेता अब लोगों को पकौड़ा तलने की नसीहत दे रहे हैं, सीबीएसई पेपर लीक ने अठाईस लाख छात्रों का भविष्य खतरे में डाल दिया है और देश के शिक्षा मंत्री खुद छात्रों से अपील कर रहे हैं कि वो पेपर्स लीक को रोकने केलिए भविष्य में ठोस क़दम उठाएं।

खुद को चौकीदार कह कर लोगों से वोट मांगने वाले प्रधानमंत्री को आज ये नहीं मालूम कि उनके एक नहीं दो नहीं तीन तीन पूंजीपति दोस्तों ने आम जनता का हज़ारों करोड़ों रूपये का घोटाला करके कैसे फरार हो गए। फैजियों की दुहाई देकर राष्ट्रवाद का गुणगान करने वाली सत्ताधारी पार्टी पिछले चार साल में पडोसी देश द्वारा सरहदों पर देश के जवानों की निर्मम हत्या को रोकने में नाकाम रही है। ये वही पार्टी है जिसके नेता नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की बात कर आप से आप का वोट मांगा था और आप में से कुछ ने उन पर विश्वास भी कर लिया था। अब खुद उनकी सरकार के आंकड़े कह रहे हैं कि पिछले साल नोट बंदी के बावजूद बाद सिर्फ कश्मीर में आतंकवादी हमलों में तीन सौ फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई। कांग्रेस को बिरयानी के नाम पर कोसने वाले मोदी खुद नवाज़ शरीफ के घर केक खाने कैसे लाहौर पहुँच गए थे, ये हमने भी देखा और आपने भी।

जिस नोटेबंदी को देश के हित में बताकर प्रधानमंत्री ने आपसे पचास दिनों का समय मांगा था, आज पांच सौ दिनों बाद भी न तो किसी को उस का फायदा नज़र आया है और ना ही रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया वाले पुराने नोटों की पूरी तरह गिनती कर पाए हैं। हाँ, उसका दुष्परिणाम आप सबके सामने है, कारोबार पूरी तरह ठप्प हो चूका है, बेरोज़गारी मुसलसल बढ़ती जा रही है और युवा वर्ग को ये पता नहीं कि वो अपना फ्यूचर या भविष्य कैसे सुनिश्चित करे।

यही वो रीसंज या वजहें हैं जिन्हें छुपाने केलिए बिहार और बंगाल में नफरत को होली खेली जा रही हैं। ज़ाहिर है इससे पहले कि आप सत्ताधारी पार्टी से सवाल पूछ लें कि उनके वादों का क्या हुआ, इस के गुर्गों ने आप लोगों को हिन्दू मुस्लमान के मुद्दों में उलझा दिया है।

सलाम है आसनसोल के उस इमाम को जिन्होने अपना जवान बेटा खोने के बावजूद भी इंसानियत का मुज़ाहिरा किया और इंसानियत की ज़बरदस्त मिसाल पेश की। आज मैं अपने बिहार वासियों और बंगाल के भद्रलोक से अपील करता हूँ कि खुदा, भगवन और गॉड केलिए खून की होली खेलना बंद कीजिये। खुद को एक पार्टी बिशेष के हाथों की कठ्पुतली होने से बचा लीजिये। याद रखिये, लाशों की खेती करने वाले भी लाशों के इर्द गिर्द रहना पसंद नहीं करते।

अपनी कोशिशों से अपने आस पास की जगहों को जन्नत बनाइये। आपकी हरकतों से क़ब्रिस्तान और शमशान में रौनकें तो बढ़ जाएंगी लेकिन वो आपके और आपके बच्चों के भविष्य को एक लम्बे समय केलिए अँधेरे में धकेल देंगी।

बक़ौल अल्लामा इक़बाल ‘ना समझोगे तो मिट जाओगे ए हिन्दुस्तां वालों, तुम्हारी दास्ताँ तक भी ना होगी ना दास्तानों में।