नोटबंदी और फ़्रांसिसी राज्यक्रांति, जबकि कोर्ट के साहब ने कहा दंगे हो जाएंगे!

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ब्लॉग: Anand Rajadhyaksha (यूनाइटेड हिन्दी) – सब से पहले एक बात समझनी होगी कि सब को जेल में ठूंसने का सरकार का कोई इरादा नहीं, उतने जेल भी भारत में नहीं होंगे। सब पर मुकदमे भी होंगे तो लम्बे खींचेंगे, ख़ास कर नेताओं पर और नतीजा आने के पहले वे शांति से मर जायेंगे। बाद में उनके कार्यकर्ता उन्हें victim घोषित कर के मातम मनाएंगे।

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जहाँ तक बात समझ में आती है, सरकार का उद्देश काले धन से चलती समान्तर अर्थव्यवस्था को उखाड़ना था, और उसमें भी जो जाली नोट हैं, उन्हें ख़त्म करना था। कोई व्यक्ति नहीं मिलनेवाला जो सरगना कहलायेगा। किसी को पकड़ा भी जाए तो भी उसके पोलिटिकल संबंधों से उसे अरेस्ट करना सरदर्द होगा। नोटबंदी से उनकी ताकत ख़त्म हुई है यही बड़ा फायदा है। ४०% से अधिक नुक्सान झेलना मुश्किल होता है, यहाँ इससे अधिक हुआ है जो नेताओं के बिलबिलाहट से पता चलता है।

अब अचानक बड़ा डिपोजिट जिन्होंने किया है उन्हें नोटिसें आने लगी हैं. इससे सच कहे तो उन्हें डरने की जरुरत नहीं है. डरने की जरुरत उनको है जिन्होंने ये पैसे अकाउंट में डालने दिए थे। उन्हें पता होगा कि उनका नाम उगला जाएगा, थोड़े से कमीशन के लिए कोई गरीब पेनाल्टी कहाँ से भरेगा और पेनाल्टी के पैसे कहाँ से आये इसका भी जवाब कहाँ से देगा ? लेकिन यहाँ भी यही बात मीडिया ले आयेगी कि गरीब को परेशान किया जा रहा है – यह नहीं बतायेगी कि गरीब के पास पैसे कहाँ से आये?

पैसे कहीं कहीं निकल रहे हैं. ये छोटी मछलियाँ हैं जो हताशा में फड़फडा रही हैं। बड़े लोग नुकसान झेलकर चुप हैं। भरे बैठे हैं लेकिन चुप रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकते. ख़ास कर भ्रष्ट नौकरशाहों और अन्य सरकारी कर्मचारियों पर इनकी मार बड़ी है। अगर इनमें मौतें हुई हैं तो उनको प्रसिद्धि दिला कर भुना भी नहीं सकते यह कोढ़ में खाज है।

पोस्ट के टाइटल में मैंने फ़्रांसिसी राज्यक्रांति का नाम लिया था। क्या सम्बन्ध है ?

देखें तो केवल मानसिकता का है। जनता के आक्रोश के कारण फ़्रांसिसी राज्यक्रांति हुई थी लेकिन वहां जबरदस्त अराजक फैला था और किसी के भी जान माल की शाश्वती नहीं थी। आज यहाँ जनता आक्रोशवश मोदी जी का साथ दे रही है क्योंकि वो चाहती है कि काले धन से ही जिनकी ताकत हैं ऐसे धनपशुओं की हेकड़ी निकल जाए।

यहाँ देखने मिलता है कि लोगों को भड़काया जा रहा है कि किसी बड़े आदमी को सजा हुई ही नहीं है। कोई बड़ा अमीर लाइन में लगा नहीं है, इसलिए यह सब आँखों में धूल झोंकना और इससे केवल आम आदमी परेशान हो रहा है। अमीर उस तरह से परेशान नहीं हो रहा है इसलिए यह सब फेक है। और इसका असली सन्देश यही होता है कि चलो आओ, दंगे करें….

वैसे आम आदमी के लिए परेशान हो रहे रवीश या बरखा को किसी ने लाइन में देखा ? कौनसे नेता को वास्तव में लाइन लगानी पडी है ? जरुरत नहीं है यह सब जानते हैं, यह केवल अराजक भड़काने के लिए प्रयास हो रहे हैं।

वैसे देखने लायक बात यह भी है कि ठेला- खोमचा- रेहड़ीवाला कार्ड से पैसे लेगा, उसके लिए तुरंत तैयार भी होगा। क्योंकि वो रोज कमाएगा तभी खा पायेगा, आराम से बैठ नहीं सकता। दुकानदार ज्यादा अकड़ रहे हैं, उन्हें कार्ड से व्यवहार नहीं करने। कारण बताने में कतराते नहीं, भड़ास निकालते कहेंगे कि आप पहले सरकारी कर्मचारियों को ईमानदार बनाइये, हम भी इमानदार हो जायेंगे। वही, जाओ पहले उसका साइन ले आओ वाला फार्मूला है। आम आदमी को इनके लिए ख़ास सहानुभूति नहीं होती, लेकिन भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी उसके लिए भी चिढ का मुद्दा है।

समस्या जो दिख रही है वो यह है : व्यापारी वर्ग जो इस बात से नाराज है, अपने से छोटे व्यापारियों को तथा रेहड़ी पटरी ठेले वाले को व्हाईट में बेचने से इनकार कर देगा और न क्रेडिट देगा। रोज बैंक से पैसे लाना उस छोटे आदमी के लिए मुमकिन नहीं और यहाँ उसके ग्राहक भी वस्तुओं की अनुपलब्धता से परेशान होंगे। दुकानदार भी “कार्ड से पेमेंट लेते नहीं जी “ बोलने लगे तो खुले पैसे न होने की वही परेशानी ग्राहक की भी। बरदाश्त की अपनी अपनी मर्जी की हद है। अपनी मर्जी से लाइन लगाना और लाइन लगाना जरुरी होना इन दो बातों में लोग फर्क करते हैं। यह उनका समर्थन न माना जाए, लेकिन वास्तव है।

जले भुने सरकारी कर्मचारियों का रोल कम नहीं होगा। क्षतिपूर्ति के लिए घूस का रेट बढेगा। हजार के नोट न होने से घूस का रेट भी बढ़ जाएगा। कहाँ तक झाड़ू चलेगा ? लेकिन यही बात को बताया जाएगा – देखो, इसका क्या कर पाया तुम्हारा मोदी ?

अगर किसी जन आन्दोलन का हम अभ्यास करें तो पायेंगे कि उसमें शामिल अधिकांश जनता को आंदोलन के उद्देश्यों की समझ कम होती है। उनकी अपनी समस्याएं होती हैं और अगर समस्याओं का सीधा सम्बन्ध सरकार से जोड़ा जाए तो वे साथ देते हैं। ‘हमें का हानि’ वाली मनोदशा होती है। उनका नुकसान करो, उन्हें तकलीफ पहुँचाओ और कहो कि सरकार पर दबाव डालिए, वे साथ देने की पूरी संभावना होती है। कारण यह भी है कि उनसे कहनेवाला व्यक्ति उनका परिचित होता है। सच तो यह है कि उस व्यक्ति को भी ज्यादा समझ नहीं होती। पूछो तो यही बताएगा – मेरा नुकसान हो रहा है वो बंद होना चाहिए, बाकी मुझे कुछ समझना नहीं है। कुल जमा ये न समझने वाले किसके हाथ मजबूत कर रहे हैं ये उन्हें पता नहीं है और जानना भी नहीं है यह विडंबना है। कारण यह भी है कि टैक्स न देने का इनको कोई अपराधबोध नहीं है। बिल न लेने से आपके कितने पैसे बचेंगे यह आप को उत्साह से बतानेवाले यही होते हैं। और यही लोग ये भी कहेंगे कि आप पहले सरकारी नौकरों को इमानदार बनाइये, हम भी बेईमानी छोड़ देंगे….  जाओ पहले….

विमुद्रीकरण सुगम, सरल और बिना किसी असुविधाके होना संभव नहीं था। इसलिए असुविधा को बढाने का पूरा प्रयास किया जाएगा। निर्णय अब बदल नहीं पायेगा इसलिए कुछ निर्णय आप को भी करने होंगे।

जज ने कहा “दंगे हो जायेंगे ! जबकि “दंगे हो जाते नहीं, दंगा कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है कि बिना किसी से करवाए हो जाए! दंगे करवाए जाते हैं, लोग करते हैं और उनके उद्देश्य होते हैं, दंगे करने के लिएसोची समझी कृति है दंगा! इसलिए जो दंगे ‘हो जाने’ की आगाहियाँ करते हैं उन्हें यह बता देना चाहिए कि दंगे हो जाते नहीं, करवाए जाते हैं। कौन करेगा दंगे ? अगर आप सीना ठोंक कर कह रहे हैं कि दंगे होंगे, तो आप को यह भी पता ही होगा कि दंगे करवाने – करने वाले कौन होंगे! जरा बताइये कौन करनेवाले हैं दंगे ताकि पुलिस अग्रिम कारवाई कर सके। आप एक प्रतिष्ठित और जिम्मेदार नागरिक हैं, पुलिस की मदद करना आप का फर्ज है। बताइए कौन दंगा करनेवाला है?

लगता है हम मीडिया वालों से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर रहे हैं। वे बेचारे मालिक की मर्जी संभालकर नौकरी बचाए या असली पत्रकारिता करें? घर तो नौकरी से चलता है जी, पत्रकारिता के बारे में फिर कभी सोचेंगे, ठीक ?

कोई नहीं, लेकिन हमें तो पता होना चाहिए, दंगे हो जाते नहीं, करवाए जाते हैं।

और हाँ, दंगे होने के बाद उनको लेकर मुक़दमें दायर हो जाते हैं। मुकदमे का उद्देश्य यही होता है कि सच साबित किया जाए। याने अगर पॉलिटिकली दिक्कत न हो या फायदा हो तो दंगे किसने और क्यों करवाए यही साबित करना कोर्ट का काम होता है ?

ऐसे में “दंगे हो जायेंगे” सुनकर …. आश्चर्य तो नहीं, … खैर, जाने दीजिये….

एक ऐतिहासिक उदाहरण देता हूँ। लामबंद और एक ध्येय से प्रेरित छोटी सेनायें भी अपने से बहुत बड़ी सेनाओं पर भारी पड़ती है अगर बड़ी सेना भी एकजूट और अनुशासित नहीं हो। हमारे इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं। आज नोटबंदी से जिनका धन ख़त्म हुआ है वे लामबंद छोटी सेना हैं और सुसूत्र रूप से पूरे देश के नागरिकों की बड़ी सेना को परेशान कर रहे हैं। एकजूट आवश्यक है अगर फ़्रांसिसी राज्यक्रांति जैसा अराजक लाना नहीं है।

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