एमपी सरकार की स्कीम: मंदिरों के पुजारी बनकर बनिए करोड़ों रुपये की जमीन के मालिक

*जर, जोरू से आगे जमीन…*
*कहते है कि दुनियाँ के तमाम झगड़ों की जड़ में जर-जोरू और जमीन रही है लेकिन आज देखे तो केंद्र बिंदु में जमीन आ गई है और बाकी सब इसके इर्द-गिर्द घूम रहे है!* आज धर्मनिरपेक्षता की आड़ में धार्मिक स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा कार्य जमीनों पर कब्जे का हो रहा है। अगर कमाई का स्रोत, रहने को जगह चाहिए तो हरि चुन्नी या एक तस्वीर की जरूरत है। मेरे पिछले लेख *”धर्म बहुत उपयोगी है”* लेख के माध्यम से जमीन पर कब्जे की इस प्रक्रिया को मैंने स्पष्ट किया था।

*मंदिर-मस्जिद की आड़ में करोड़ों की जमीनें हड़पी जा रही है। बड़े-बड़े आश्रम फार्म हाउस की तर्ज पर स्थापित किये जा रहे है।*
*हिंदुओं का बापू आशाराम जब दुष्कर्म के आरोपों के बाद गिरफ्तार हुआ तो अपुष्ट खबरों के मुताबिक 60 हजार करोड़ रुपये की संपदा का मालिक निकला! गुरमीत रामरहीम को जब जेल भेजा गया तो हजारों करोड़ रुपये की संपदा का मालिक निकला। मोह-माया से दूर रहने का ज्ञान बांटने वाले ये ढोंगी अरबों रुपये एकत्रित कर रहे है!*

*राजस्थान की मनुवादी व्यवस्था की गुलाम सरकार ने पिछले दिनों पुष्कर में करोड़ों रुपए मंदिरों को चमकाने के लिए आवंटित किए तो कई सवाल खड़े हुए। एक तरफ बर्बादी की कगार पर खड़े किसान सरकार की तरफ राहत की उम्मीद लगाकर जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे है तो दूसरी तरफ बेरोजगार युवा अपराध के दलदल में फंस रहे है व बुजुर्गों को काटकर वीडियो डालकर हिन्दू शेर बन रहे है।* सरकार किसानों की ऋण माफी व बेरोजगारों को रोजगार की बात आती है तो वितीय कमजोरी का रोना शुरू कर देती है। धर्म निरपेक्षता का नकली चोला ओढ़कर चल रही मानवता के दुश्मन मनु महाराज की सरकार के पास धार्मिक स्थलों पर खर्चा करने के लिए पैसों की कोई कमी नहीं है।

*आपके सामने दो सरकारी निर्णयों का ब्यौरा रखता हूँ। पहला निर्णय राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत सरकार के समय लिया गया था।जितने भी पुराने गढ़-किले थे उनको जीर्णोउद्धार के नाम पर करोड़ों रुपये बांटे गए थे। हवाला दिया गया था पर्यटन को बढ़ावा देने का! किलों का मालिकाना हक सरकार ने अपने पास नहीं लिया बल्कि पुराने सामंतों को ही ट्रस्ट की आड़ में मालिक बना दिया गया।जनता के खून-पसीने की कमाई से भरे टैक्स के पैसों को सामंतों के उद्धार में खर्च कर दिया गया!*

आप अपने आसपास के किलों को देख लीजिए। *कौन मालिक है व पर्यटन की आड़ में जो पैसा कमाया जा रहा है वो किसकी जेब मे जा रहा है?* राजस्थान की जनता के *दिलों-दिमाग मे बैठे पुराने अत्याचारों के ख़ौफ़ को हरा करते ये गढ़-किले कमाई के अंडे किसको दे रहे है?* इस एक निर्णय ने किसान सभा व प्रजामंडल द्वारा आजादी के समय लड़ी लड़ाई पर पानी फेर दिया।

ऐसा ही एक निर्णय मध्यप्रदेश की सरकार ने लिया है। अब किसानों के शवराज मामा की सरकार मंदिरों की जमीनें पुजारियों के नाम करेगी। *वैसे तो हमे यह बताया जाता है कि मंदिर सार्वजनिक स्थल होते है लेकिन उसका अघोषित मालिक तो पंडे-पुजारी ही होते है।* अब बकायदा *राज्य सरकार कब्जाई जमीनों पर बने मंदिरों को अपनी तरफ से मान्यता देकर उस जमीन की रजिस्ट्री पुजारी के नाम करेगी।* *होना तो यह चाहिए था कि सरकारी जमीनों पर हुए इन अतिक्रमणों को हटाकर गरीबों के लिए आवास की सुविधा उपलब्ध करवाई जाएं लेकिन सरकार इसके उल्टे जमीनों पर कब्जे की इस गलत परंपरा को बढ़ावा देगी।*

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