शर्मनाक: देश के लिए शहीद हुए जवान की शव यात्रा में नहीं पंहुचा सरकार का कोई मंत्री

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यूनाइटेड हिन्दी – हिंदुस्तान में आजकल जिधर भी देखो उसी और आपातकालीन की सी हलाता बनी हुयी दिखाई पड़ रही है। जहां एक और किसानो, दलितों और मुसलमानो पर अत्याचार ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है तो दूसरी ओर भारतीय जवानो और मीडिया का अपमान करने में भी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।

जिधर देखो उधर सरकार और उनके द्वारा चलाये जा रहे कुछ गुंडई संगठनो ने लोकतंत्र को दबाकर अपनी दहशतगर्दी फ़ैलाने में अपना पूरा जोर लगा रखा है। इन असामाजिक तत्वों के संगठनो ने देश की कानून वयवस्था को अपने हाथो में ले लिया है। देश के ठेकेदार बने रहकर ढोंगी राष्ट्रवादी का यह खेल देश की लोकतंत्र पर गहरा दाग नज़र आ रहा है।

भारतीय मुसलमानो से राष्ट्रवादी और देशभक्त होने का सर्टिफिकेट (प्रमाणपत्र) मांगने वाले एक तरफ बड़ी-बड़ी ढिंगे करते है और दूसरी और जहाँ खुद के राष्ट्रवादी होने की दलील मांगी जाये तो इनके पास न तो कोई जवाब है न कोई इनका ऐसा कार्य नजर आता है जिससे इन्हें देशभक्त कहा जा सकता है।

अंतिम यात्रा
अंतिम यात्रा

ऐसा ही एक मामला आज़मगढ़ मे सामने आया है जहाँ हिंदुस्तान की सेना का एक बहादुर जवान शहीद हो गया लेकिन इन सभी ढोगी राष्ट्रवादियो में से एक भी उसकी शव यात्रा में नज़र नहीं आया। यह भारतीय शहीद मात्र 25 वर्ष का था जो देश के लिए बॉर्डर पर दुश्मन की गोली खाकर शहीद हो गया है।

रियाजुद्दीन खान दानिश कश्मीर बॉर्डर पर हिंदुस्तान की रक्षा के लिए लड़ते हुए कुर्बान हो गये। दानिश उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ के कोल्हापुर के रहने वाला था। आज़मगढ़ वही शहर है जिसे सरकार आतंक से जोड़ने में कभी हिचकिचाती नहीं है, लेकिन आज जब वहाँ का एक जवान देश के लिए शहीद हो गया तो सरकार और उनके दल्ले बने फिर रहे कुछ मीडिया चैनेलो पर सन्नाटा सा छा गया है।

यूनाइटेड हिन्दी की खबरों के अनुसार रियाजुद्दीन खान दानिश भारत के मुकुट कश्मीर में तैनात था। दानिश उसी देश (पोर्किस्तान) की गोली खाकर शहीद हुए है जहाँ भारत के मुसलमानो को बात-बात पर भेजने की धमकी दी जाती है। जहाँ अपने हिंदुस्तान के लिए पाकिस्तान की गोली खाकर शहीद होने वाले इस जवान पर मीडिया के और सोशल मीडिया के तथाकथित राष्ट्रवादी तो खामोश है ही। भारत सरकार ने भी इस पर ऐसी चुप्पी साधी है जैसे की सरकार की ज़बान को लकवा मार गया हो! इस ख़ामोशी से एक बात तो साफ़ हो गई है की मुस्लमान भले ही इस देश के लिए अपनी जान भी दे दे लेकिन उनकी देशभक्ति हमेशा से संदिग्ध ही रहेंगी।

हम आपको बता दे की दानिश ऐसे पहले मुस्लमान नहीं है जिन्होंने हिंदुस्तान के लिए अपनी जान देकर हिंदुस्तान देश का नाम रौशन तो किया ही है और साथ ही हिंदुस्तान की सुरक्षा बरक़रार रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे सैनिक की शहादत पर इतना गहरा सन्नाटा काफी सवाल खड़े करता नज़र आ रहा है! यह सन्नाटा बात-बात पर भारतीयो को पाकिस्तान चले जाने की नसीहत देने वाले राजनेताओ की सोच पर सवाल खड़े करता है।

शहीद दानिश को आखरी सलामी उनके गाव कोल्हापुर में दी गई। बेहद दुख़द है की उनकी अंतिम यात्रा के मौके पर न उनको बंदूको से सलामी दी गई और न ही कोई बड़ा राजनेता या सरकारी अफसर वहाँ मौजूद था। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझने वाली मौजूद सरकार समाजवादी पार्टी से भी कोई नेता उनकी अंतिम यात्रा में उपस्थित नहीं हुआ था। देश पर कुर्बान होने वालों को सरकार द्वारा किये जा रहे मुस्लमान और गैर मुस्लमान में यह भेदभाव देश की एकता के लिए काफी शर्मनाक बात है। सरकार की इस हरकत से यह साफ़ हो गया है की मुस्लमान और बाकि नागरिको में यही अंतर है।

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