ब्लॉग: किताब की नहीं अपने दिल और अंतरात्मा की आवाज़ सुनो….

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अभिजीत सिंह (यूनाइटेड हिन्दी) – ये उस समय की बात है जब अटल जी प्रधानमंत्री थे, देश में गाय का विषय उन दिनों भी चर्चा में था पर उस समय वो आज की तरह सड़क पर या सोशल मीडिया में नहीं बल्कि अखबारों के सम्पादकीय स्तंभों में दिखता था। आर० एस० शर्मा, रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब जैसे फर्जी इतिहासकार लगातार ये दुष्प्रचार कर रहे थे कि प्राचीन भारत में हिन्दू गोमांस खाते थे और वेदों में तथा दूसरे हिन्दू ग्रंथों में गोवध और गोमांस भक्षण की अनुमति है।

दिल और अंतरात्मा की आवाज़ सुनो
दिल और अंतरात्मा की आवाज़ सुनो

डी० एन० झा ने तो बाकायदा “दी मिथ ऑफ़ होली काऊ” नाम से एक किताब भी लिख दी थी। मैं ट्रेन से दिल्ली जा रहा था, मेरी साथ वाली सीट पर एक आर्यसमाजी थे, इस विषय पर चर्चा शुरू हुई तो बड़े दंभ के साथ उन्होंने कहना शुरू किया कि मैं वेदों से साबित कर दूंगा कि हमारे प्राचीन भारत में कभी भी गोमांस भक्षण या गोवध का विधान नहीं रहा।

मैं उनसे पूछ बैठा कि मान लीजिये कि वेदों में ऐसी आज्ञा है तो? वो नाराज़ हो गये, बोले, जब है नहीं तो कैसे मान लें? मैंने कहा, कल्पना के तौर पर ही पर मान लीजिये कि वेदों में ऐसी आज्ञा है तो आप या हम क्या करेंगे? इस प्रश्न पर वो मौन थे। मैंने उनसे कहा, गाय पर हमारा ऐसा स्टैंड ही गलत है कि हम वेदों में गोमांस भक्षण या गोवध होने या न होने पर विमर्श करने की सोचने लगतें हैं।

उन्होंने कहा, तो फिर क्या करें? मैंने कहा, कहिये कि हो सकता है कि हमारे वेदों में या प्राचीन काल में गोहत्या या गोमांस भक्षण का वर्णन या विधान हो पर चूँकि हमारी अंतरात्मा गाय को माँ मानती है, उसे पूजनीय मानती है इसलिये हम न तो उसका वध कर सकतें हैं और न ही गोमांस भक्षण की कभी सोच सकतें हैं। वेदों में क्या है या प्राचीन भारत में क्या रहा हम उसे लेकर आज क्यों चले, मान लीजिये किसी विकृति के कालखंड में ये कुरीति हमारे अंदर आ भी गई थी तो क्या अब उसका सुधार करना हमारी उत्तरोतर प्रगति का द्योतक नहीं है? वेद ने कहा तो ही मानेंगे की मूढ़ता हमें “एक किताब और एक पैगंबर” वाले मजहबों के साथ नहीं खड़ा कर देती?

ऐसा ही बात मैंने अपने एक मुस्लिम मित्र से भी कही थी जिसने मुझे कहा था कि प्राचीन काल में हिन्दू और आपके ऋषि-मुनि अगर गौमांस खाते थे तो अब परहेज क्यों? मैंने उससे प्रतिप्रश्न करते हुए पूछा, रसूल साहब के हाथों इस्लाम लाने वाले कई लोग ऐसे थे जो इस्लाम पूर्व बहुत बड़े मूर्तिपूजक थे तो इस आधार पर यही बात मैं भी आपसे कह सकता हूँ कि जब 1400 साल पहले अरब वालों के पूर्वज मूर्तिपूजा करते थे तो आप क्यों नहीं करते और इससे परहेज क्यों? अगर मैं आपसे ऐसा पूछूं तो मेरा ऐसा पूछना जायज होगा? उसने इनकार में सर हिलाते हुए कहा, जब हमें ये समझ में आ गया कि बुतपुरस्ती गलत है तो फिर उसे करने का कोई मतलब नहीं है। मैंने कहा, तो यही सोच आप हमारे बारे में क्यों नहीं बनाते? पहले गोहत्या होती थी इसलिये अभी भी होनी चाहिए फिर तो यही बात मैं आपके लिये मूर्तिपूजा के सन्दर्भ में भी कह सकता हूँ।

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