किसान संघर्ष का तरीका बदलें… 23 दिसम्बर को जयपुर में होगी किसान महरैली…

सबका पेट भरने वाला खुद आज भूखा है तो कहीं न कहीं चूक किसान खुद करता जा रहा है! देश की सबसे बड़ी आबादी आज किसानों की है लेकिन व्यवस्था की धारा में किसान किनारे पर खड़ा है। कृषि मंत्रालय का नाम बदलकर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय रख देने मात्र से किसानों की हालत सुधरने वाली नहीं है। किसान अर्थव्यवस्था का प्राथमिक उत्पादक है व 70% आबादी होने के कारण प्राथमिक उपभोक्ता भी। किसान हमेशा देश को देता ही है लेता कुछ नहीं है! किसान सीमाओं की रक्षा करने के लिए अपने बेटों को भेजता है व खुद देश का पेट भरने के लिए रात-दिन, गर्मी-सर्दी में लगा रहता है। अगर किसान अपनी मेहनत के मूल्य में से कुछ हिस्सा खुद की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मांगता है तो वो कोई खैरात नहीं मांग रहा है।जब हर शारीरिक श्रम की कीमत वसूल रहा है तो किसान अपने श्रम की कीमत का हिस्सा मांग ले तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

आज किसानों की हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। न सरकारों से और न गैर-सरकारी संगठनों से। तमाम किसान नेता भी बखूबी जानते है कि किसान की हालत आंदोलन/रैलियों में भाग लेने लायक भी नहीं है। जो किसान नेता आंदोलन करते है वो बखूबी जानते है कि इन आंदोलनों का खर्चा कौन उठाते है। रैलियों के लिए पैसों का इंतजाम कौन करता है? जो लोग अपना राजनीति में धरातल तलाश रहे होते है वो किसानों को एकत्रित करके अपना शक्ति प्रदर्शन करके राजनैतिक पार्टियों से मोलभाव करके अपनी जगह मजबूत कर लेते है। हर रैली/आंदोलन के बाद किसान ठगा सा महसूस करता है। आजादी से पहले भी यही होता रहा था व आजादी के बाद के 72 सालों में हर बार यही हुआ। इक्के-दुक्के जो फैसले किसानों के हित मे हुए वो किसान राजनेताओं ने अपने दम पर सत्ता में घुसकर छीनकर किये है।सर छोटूराम, चौधरी चरणसिंह जी, चौधरी देवीलाल जी, डॉक्टर लोहिया, शरद यादव जी, कुम्भाराम आर्य जी, बलदेवराम जी मिर्धा, परसराम जी मदेरणा आदि लोगों ने सिस्टम में घुसकर, लड़कर किसानों को हक दिलाये है।

आज पूरे देश मे पिछले दो सालों से जगह-जगह लगातार किसान आंदोलन चल रहे है, रैलियां हो रही है, किसान यात्राएं चल रही है इससे किसानों को क्या फायदा हो रहा है? इनके दबाव में आकर सरकारों ने कितनी सहूलियतें दे दी? किसान आज भी भ्रमित होकर वहीं खड़ा है! किसान आज भी रोज आत्महत्या कर रहे है! हाँ, थोड़ी जागरूकता जरूर आई है इनसे लेकिन जागरूकता के दूसरे भी बहुत सारे विकल्प है हमारे पास क्यों न उनको आजमाया जाएं।

रैलियों के नाम पर, आंदोलनों के नाम पर क्यों किसानों को खेतों से उठाकर सड़कों-स्टेडियमों में धकेला जा रहा है? एक तरफ काम मे बाधा दूसरी तरफ गाड़ियों व अन्य इंतजामों में बेतहाशा धन फूंका जाता है। अगर राजनैतिक मंशा वाले लोग आपको फाइनेंस न भी कर रहे हो लेकिन पैसा व समय आखिर जाएगा तो किसानों की जेब से ही!

किसानों ! अगर खुद का भला चाहते हो तो संघर्ष का तरीका बदल डालो। सर छोटूराम को याद करो, चौधरी चरणसिंह को याद करो! बाबा साहेब अंबेडकर को याद करो।जो तुम्हारे हजारों तथाकथित किसान नेता तुम्हारे लिए नहीं कर पाए उससे ज्यादा दलित भाइयों के लिए अकेले बाबा साहब ने कर दिया था। इसलिए व्यवस्था में घुसने के तरीकों की तरफ बढ़ो! बिना सत्ता के कितनी ही रैलियां कर लो, धरने दे लो, आंदोलन कर लो कुछ भी हासिल नहीं होगा। मत लोकतंत्र का इंजिन है और वो आपके पास भरपूर मात्रा में है। धर्म/जाति/सम्प्रदाय आदि को दरकिनार करके सत्ता पर कब्जे की ओर बढ़ो। तमाम पुराने/वर्तमान के मतभेदों को भूलकर एकजुट हो जाओ क्योंकि हमें भविष्य संवारना है। बिना राजनैतिक रोड-मैप के /बिना डंडे व झंडे के/बिना एक नाम के/बिना एक निशान के कितनी ही रैलियां कर लो सिर्फ खुद की बर्बादी के अलावे कुछ नहीं मिलेगा।

हर तरह के भ्रम/मतभेद/व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए सत्ता की तरफ कुछ करो! खुद को बेचारा समझने की भूल मत करो! हर किसान एक सुलझा हुआ राजनेता बनेगा तभी बात बनेगी। यह माद्दा तुम्हारे अंदर है बस उसको पहचानों और आगे बढ़ो???

बार-बार ग़ालिब , यही भूल करता रहा!
धूल चेहरे पर थी, शीशा साफ करता रहा!!

ऐ किसान! अब यह भूल में भूल नहीं होनी चाहिए!
अब उठ तूँ, लड़ाई धूल में फिजूल नहीं होनी चाहिए!!