राजपूत और जाटों को आमने-सामने दिखाकर ब्राह्मण-बणियों इनको आपसा में लड़वा रहे हैं….

राजपूत और जाटों को आमने-सामने दिखाकर ब्राह्मण-बणियों हमें लड़वा रहे हैं, राजपूतों के साथ न्याय हो जाट इस बात के समर्थन में हैं, लेकिन राजपूतों को जाति जनगणना का समर्थन करना चाहिए, जिससे कि सामाजिक न्याय और लोकतंत्र मजबूत हो।

आनंदपाल के मामले में जो धारणायें बनाने की कोशीश हुई उनकी पड़ताल करते हैं। सबसे पहले उन धारणाओं को देखते हैं। पहली धारणा है कि करणी सेना के लोगों ने जाटों के ख़िलाफ सोशल मीडिया में वीडियो संदेशों के जरिये ज़हर घोल कर पूरे मामले को जाट बनाम राजपूत बनाने की कोशीश की. दूसरी धारणा में राजपूतों ने आनंदपाल के मामले में मानवाधिकार की बात करते हुये न्याय के पक्ष में दिखने की कोशीश की।

दोनों धारणायें झुठी हैं, ग़लत हैं।

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पहली धारणा के ज़रिये करणी सेना और राजपूत समुदाय के लोगों ने अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कुंठा को साधने की कोशीश की है। हम सब जानते हैं कि आज़ादी के बाद राजपूतों की राजशाही चली गई। उनकी आर्थिक और राजनैतिक ताकत में ज़ोरदार गिरावट आई। शिक्षा और नौकरियों में वे तेजी से पिछड़ें क्योंकि वक्त के साथ ख़ुद को बदल लेने में वे पिछे रहें।

दरअसल, सवर्णों के अंदर जहां ब्राह्मणों और बणियों की सामाजिक और आर्थिक ताकत आज़ादी के बाद भी कई गुना तेजी से बढ़ी। गांधी और नेहरू की जोड़ी ने ब्राह्मण और बणियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया। ब्राह्मण हर राजनैतिक पार्टी के शिखर पर बैठ गये और आरएसएस तो ब्राह्मण संगठन है ही। ब्राह्मणों ने मंदिरों, त्यौहारों, व्रतों, यज्ञों, स्कूलों में ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के जरीये समाज में ओर मजबूती हासिल की। ठीक इसी तरह बणिये गांधी के स्वदेशी का नारा लगाते हुये और चरखा कातते हुये, देखते ही देखते बजाज, बिड़ला, तापड़िया, गोयनका, सिंघानिया जैसे ब्रांड बन गये। कुल मिलाकर सवर्णों के अंदर ब्राह्मण-बणिया जोड़ी मज़े में हैं।

लेकिन राजपूतों की राजशाही चली गई। राजपूतों की बड़ी संख्या अब भी गांवों में हैं जो किसानी करते है। वे शिक्षा में ध्यान नहीं दे पाये। दूसरी तरफ ब्राह्मण-बणिये शहरों में हैं और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। सवर्ण एक तरफ नोकरियों में गैरलोकतांत्रिक तरीके पचास फिसदी हिस्सा घेर लेते हैं, लेकिन सवर्णों के अंदर यह हिस्सा ब्राह्मण खा जाते हैं और बचा-खुचा राजपूतों को मिलता है।

लेदेके जिस राजपुत समुदाय ने हमेशा अपने हक़ से ज्यादा खाया, अब सवर्णों के अंदर उनकी हालात बहुत पतली है। राजस्थान में स्व. बाबोसा भैरोंसिंह शेखावत के बाद पिछले दो दशकों में राजपूत कुंठीत हो चुके हैं, वे ब्राह्मण-बणियों से अलग भी नहीं होना चाहते और सीधे-सीधे भीड़ंत भी नहीं चाहते।

इसीलिए राजपूत जाटों को सामने/आगे करके ब्राह्मण-बणियों से लड़ रहे हैं।

वे आरएसएस और बीजेपी से अंदर ही अंदर मोलभाव कर रहे हैं। वे इस बहाने राजपूतों को एक बार फिर लामबंद कर रहे हैं। वे राजस्थान में अपनी खोई हुई हैसियत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे सवर्ण गठजोड़ के अंदर अभी बने रहेंगे क्योंकि अभी वे जाति के ज़हर को नहीं जानते और परिपक्व भी नहीं हैं। वे अभी ब्राह्मणवाद के हाथों ओर ठगे जायेंगे।

जाटों का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है। जाटों को समझना चाहिये कि आज़ादी के पूर्व के तीन दशकों में जाटों ने राजपूतों से तगड़ा संघर्ष किया, वे सामंतवाद उर्फ़ जातिवाद के ख़िलाफ ख़ून देकर लड़ें, लेकिन जब आज़ादी के बाद सरकार बनी तब ब्राह्मण-बणियों और राजपूतों की पार्टी कांग्रेस ने जाटों को निकाल बाहर किया।

मेरे हिसाब से इस समय जाटों की राजपूतों से कोई टक्कर नहीं है। राजपूत तो ख़ुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। जाटों को अगर लड़ना है तो ब्राह्मण-बणिया गठजोड़ से लड़ें क्योंकि देश के तमाम क्षेत्रों में इन्होंने गैरलोकतांत्रिक क़ब्जा बना रखा है। राजस्थान में दोनों ब्राह्मणवादी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस ब्राह्मण-बणिया गठजोड़ से चल रही हैं।

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