क्या जाटों की हत्या पर हत्या होती रहेगी! और साथ में भाईचारे की भागवत कथा चल पाएगी ?

शांति व सब्र को कमजोरी न समझे सामंत….
1. सांता, बाड़मेर में विरमाराम जाट की हत्या
2. सामराऊ, जोधपुर में हनुमान साईं जाट की हत्या
3. सादुलपुर, चुरू में कोर्ट परिसर में पवन पूनिया जाट की हत्या
4. लोहावट, जोधपुर में नारायण जाखड़ जाट की हत्या
5. शिव बाड़मेर में मोहनराम धेडु जाट की हत्या

प्रेमाराम सियाग : विरमाराम जाट की हत्या चुनावी रंजिश के कारण करके एक्सीडेंट से मौत होने की तरफ ट्विस्ट किया गया! आरोपों के घेरे में पुलिस-प्रशासन भी रहा है व पीड़ित परिवार व आरोपियों के समर्थन में बाड़मेर में दो बड़े आंदोलन हुए लेकिन प्रशासन निष्पक्षता से जांच तक नहीं कर पाया! सामराऊ में हनुमान जाट की हत्या शराब कारोबारियों की आपसी रंजिश में कर दी गई। न्याय दिलाने के लिए स्थानीय विधायक से लेकर खींवसर से निर्दलीय विधायक पहुंचे। 5 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया लेकिन परिवार को मदद के नाम पर एक रुपया भी नहीं दिया गया जबकि इस हत्या के बाद भड़की हिंसा में हत्यारों को जो आर्थिक नुकसान हुआ उनको 5 करोड़ रुपये दे दिए गए!

तीसरी हत्या सादुलपुर चुरू के कोर्ट परिसर में जज के सामने आपसी रंजिश में पवन पूनिया (जेतपुरिया) की गोली मारकर कर दी गई और आरोपी भाग निकले! चौथी हत्या नारायण जाखड़ की हुई! 21 जनवरी को अपहरण हुआ व 26 जनवरी को उसकी लाश एक सूखे पानी के टांके में मिली!पुलिस पर आरोप लगा कि उसने आत्महत्या का केस बनाने की कोशिश की! सूखे टांके में कोई आत्महत्या करने के लिए कैसे कूद जाएगा व कैसे मर जायेगा? पांचवी हत्या मोहन जाट की शिव क्षेत्र में की गई। गाड़ी को टक्कर मारकर लाठियों से हमला किया गया जिसमें मोहन की मौके पर ही हत्या हो गई व 3 लोग घायल है जो अस्पताल में भर्ती है!

इन पांचों घटनाओं में मरने वाले जाट समुदाय से है व हत्या के आरोपी राजपूत समुदाय से है! जाट-राजपूत भाईचारे की बात करने वाले बुद्धिभूषण इन पांचों घटनाओं पर चुपी साधे नजर आए। क्या हत्या पर हत्या होती रहे और साथ मे भाईचारे की भागवत कथा चल पाएगी?पुलिस-प्रशासन जो हर घटना में एक उदासीन, आरोपियों के विरुद्ध नरम रवैया अपनाकर, हत्या को एक्सीडेंट या आत्महत्या का रूप देकर अपनी निष्पक्षता की आबरू बचा पाया है! सड़क पर गड्ढे को देखकर स्वतः संज्ञान लेने वाली न्यायपकलिका से जज के सामने पेशी पर खड़े आरोपी की गुंडे हत्या करके भाग जाए और मुंह से आह तक न निकले तो न्याय की उम्मीद रखी जा सकती है? सरकार, पुलिस प्रशासन, न्यायपालिका व आरोपी पक्ष के समुदाय से न्याय के पथ पर ईमानदारी से चलने व भाईचारे की मिसाल बनाये रखने की उम्मीद रखी जा सकती है? मेरी व्यक्तिगक्त राय है -नहीं। मैदान में विरोध के लिए उतरे बिना इनसे निष्पक्ष न्याय की उम्मीद करना अब बेमानी सा लगता है! आज राजस्थान में न्याय मिलना असंभव हो गया है! जब न्याय मिलता नहीं है तो न्याय छिनने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है!

इन सभी घटनाओं पर एक बात ध्यान देने योग्य है कि जाट समाज के लोग चोट खाकर भी शांति की अपील कर रहे है, भाईचारा बनाये रखने की बात कर रहे है लेकिन राजपूत समाज का एक भी जिम्मेदार आदमी आगे आकर यह बात नहीं कह सका है। ताली एक हाथ से नहीं बजती है। मोहन धेडू की हत्या लूटने के लिए की गई है! कम से कम शांति व भाईचारे की बात नहीं कर सकते तो बेरोजगारी व भुखमरी की कगार पर खड़े अपने समाज की ही बात कर लेते! राजपूत समाज की बदहाली पर चिंता जताने का, भाईचारा कायम रखने का, प्रतिक्रिया न देने का एकतरफा टेंडर जाट समाज के नाम तो निकला हुआ है नहीं ! जाट इतने भी कमजोर नहीं है कि गुरबत से जर्जर समाज के रोटी के लिए अपराध में भटक रहे युवाओं को सटीक व ढंग से जवाब नहीं दे सके!

राजस्थान सरकार कानून व व्यवस्था को वोट बैंक के लिए उपयोग करने से बाज आएं! पुलिस प्रशासन निष्पक्षता के साथ काम करना शुरू करे! न्यायपालिका में बैठे मी लार्ड जाति-धर्म देखकर कानून के हाथों को लंबा-छोटा करना बंद करे! राजस्थान को अराजकता के दलदल में जाने से रोकने के लिए जब जाट समाज के नेतृत्व में दलित व अल्पसंख्यक लोग मैदान में उतरेंगे तो धर्म/जाति की राजनीति करने वाले लोग, हत्याओं से वोटबैंक बनाने की फिराक में लगे लोग और दूसरों को लूटकर मौज-मस्ती करने की लगन में लगे लोग रातों रात राजस्थान की जमीं से गायब हो जाएंगे और न्यायालय में लगी मनु की मूर्ति की जगह बाबा साहेब की मूर्ति नजर आने लगेगी! कभी मेघवालों पर, कभी मुसलमानों पर, कभी जाटों पर अत्याचार करने वाले लोग खुद पीड़ित होकर सिसकियाँ लेते नजर आएंगे! हम शांति व भाईचारा चाहते है लेकिन जब आप सीमा लांघने लग गए तो भाईचारा ठेंगें पँर रखना हमे भी आता है। हमारा समाज पढ़-लिखकर बुद्धिजीवी जरूर बना है लेकिन लठजीवी की परंपरा को भूलकर नहीं!

जाट समाज के राजनेताओं से मेरा निवेदन है कि एकजुट होकर इन घटनाओं से पीड़ित परिवारों को न्याय दिलवाएं नहीं तो चुनावों में न्याय आपको समाज देगा। जब समाज खुद न्याय करने लगता है तो न अपराधी बचते है और न तटस्थ होकर बैठे समाज राजनेता बचते है!आपके बचने का समय कम है व जल्दबाजी आपको करनी पड़ेगी! समाज ने सामराऊ में थोड़ी सी जल्दबाजी दिखाई तो आप लोग भागकर जोधपुर में आधी रात को एक साथ आ गए थे! ध्यान रखिएगा! जो नेता अपने समाज को न्याय नहीं दिलवा सकता वो किसी और समाज का भला नहीं कर सकता। हर कमजोर मजबूत के साथ सुरक्षित महसूस करता है। मजबूर नेता कभी भी सर्वधर्म व सर्वसमाज की बात करने का अधिकारी नहीं होता है।

जाटों भगवा नहीं जाट धर्म का झंडा शांति का प्रतीक सफेद है। आज तेजाजी महाराज जयंती पर उज्जैन से 

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