बहुत से अतरर्धार्मिक विवाह वाले साथ भी हैं और खुश भी, तो बहुत से स्वजातीय में भी पटरी नहीं खाती।

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ब्लॉग: कुमार प्रियांक (यूनाइटेड हिन्दी) – मितरोँ.. आजकल अतरर्धार्मिक विवाह पर लोग-बाग़ बहुत गर्मा-गर्म बहस छेड़ देते हैं भारत में। लड़का जिस धर्म का होता है, तब उस धर्म के अधिकांश लोग वाले बहुत ख़ुशी से बताते हैं कि देखो फलाने धर्म की लड़की लाया है अपना पट्ठा। ख़ुशी-ख़ुशी बधाइयाँ देते और लेते हैं..!!

जबकि लड़की के धर्म वाले अधिकांश लोग मुंह चुराते हैं या गुस्सा दिखाते हैं। माने कुल मिलाकर फिर वही पुरुष-प्रधान समाज में लड़की को इज़्ज़त से जोड़ कर देखते हैं अधिकांश लोगबाग़, जो अंततः लड़की की सोच से कोई मतलब नहीं रखता है।

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मेरे एक परिचित हैं गृहनगर में मुमताज़ भाई। ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, उम्र में मेरे से बड़े भी हैं..पर मेरे छुटपन से ही पढ़ाई-लिखाई के कारण मेरी इज़्ज़त करते थे। मैं भी अकसर उनकी मदद कर दिया था लिखा-पढ़ी में। बगल में ही उनकी दुकान थी, और मेरे द्वारा प्रेरित करने के चलते ही अखबार मंगाते थे रोज़ पढ़ने के लिए। वर्षों पहले की बात है। एक दिन ख़ुशी-ख़ुशी बोले- “प्रियांक भाई, ये देखने न अज़हरुद्दीन और संगीता बिजलानी की जोड़ी कितनी खूबसूरत लग रही है..!!” मैंने संगीता का खूबसूरत चेहरा और अज़हर का थोबड़ा देखा, फिर बोला कि “बिल्कुल, योग्यता के आधार पर सुंदर जोड़ी।”

कुछ दिनों के बाद मैं उनकी दुकान पर गया। नज़र पड़ी फर्स्ट पेज पर जहाँ ऋतिक रोशन और सुज़ेन खान की शादी की तस्वीर छपी थी। मैंने बोला मुमताज़ भाई को कि “भाई, देखिये न कितनी सुंदर जोड़ी है..!!”

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मुमताज़ भाई ठिसुआ से गए..!! वही उसी अखबार में एक कोने में खबर छपी थी कि ऋतिक-सुज़ेन की शादी के विरोध में कश्मीर में मुस्लिम लड़के व हिन्दू लड़की का निकाह हेलीकाप्टर में कराया गया। मुमताज़ भाई मुझे वह खबर दिखाने लगे। मैं मुस्करा कर मुमताज़ भाई के चेहरे के भावों को पढ़ता रहा। इस संतुलन के चलते उनका ठिसुआना थोड़ा कम हुआ था।

अब बदकिस्मती देखिये दोनों जोड़े (अज़हर-संगीता, ऋतिक-सुज़ेन) आज अलग हैं..ख़ैर..!! बहुत से अंतर्धार्मिक वाले साथ भी हैं और खुश भी, तो बहुत से स्वजातीय में भी पटरी नहीं खाती।

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अब अकबर-जोधा की जोड़ी जमी, तो मस्तानी की अम्मी रुहेला बेगम और छत्रसाल सिंह बुंदेला के बीच भी तो जमी ही थी..!! करीना-सैफ की जम रही, तो सोहा अली-कुणाल खेमू की भी जम रही। शाहरुख़-गौरी की जम रही तो मनोज बाजपेयी-शबाना(नेहा) की भी जम रही। जम रही कि नहीं जम रही मितरोँ..? 

तो बात दरअसल जे है कि जैसे-जैसे जिस समुदाय में आधुनिक शिक्षा बढ़ेगी और विशेषकर लड़कियाँ पढ़ने के लिए और फिर नौकरी के लिए बाहर निकलेंगी, तो इस तरह की शादियाँ आम होंगी। दैनिक ट्रिब्यून या इंडियन एक्सप्रेस में एक बार पढ़ा था कि 2005 से 2009 के बीच केवल कर्नाटक में अकेले मुस्लिम समुदाय (जिस पर कथित लव जेहाद के आरोप लगते हैं) की 38 लड़कियों ने गैर-मुस्लिम लड़कों से रजिस्टर्ड शादियाँ की थी। कारण क्या था भाई.. तो बस आधुनिक शिक्षा व नौकरी। तो ऐसा है कि यह प्रक्रिया अब आधुनिक समाज की देन बन चुकी है और जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर उठता जायेगा, हर धर्म के लड़कों व लड़कियों के बीच ये आम होगा।

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तो जरूरत इस बात की है कि महिला साक्षरता का स्तर उठाया जाए, महिला व पुरुष, दोनों, की सोच की इज़्ज़त की जाए। जो पढ़े-लिखे दो बालिग़ लड़के-लड़की साथ में जीवन बिताना चाहते हों, उन्हें क्यों रोकना..? अगर बाद में दिक्कत होगी तो उन्हें होगी.. फायदा होगा तो उनका होगा। हॉनर किलिंग के नाम पर उनकी हत्या बिल्कुल ही गलत है।

बस अफ़सोस एक ही चीज़ का होता है कि इन अन्तरधार्मिक विवाहों के बाद कतिपय धार्मिक संकीर्ण लोग लड़की का धर्मपरिवर्तन कराने लगते हैं। लड़की का धर्मपरिवर्तन अगर न भी करा पाएं, तो संतान तो अधिकांशतया मामलों में पिता के ही धर्म को अपनाती है। जो फिर से एक बार वही पुरुष-प्रधान समाज का सूचक व महिलाओँ की अपेक्षाकृत निम्न दशा को दर्शाता है। अतः अब पूरी ताकत से हर धर्म-जाति-समुदाय में महिला सशक्तिकरण की जरूरत है, ताकि वे अपने फैसले बालिग़ होने पर खुद ले सकें और तब जब उन्हें कोई तलाक़-तलाक़-तलाक़ कहे, तो उसे वो तड़ाक-तड़ाक-तड़ाक कर सकें..!!👍

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अब उधर देखिये कश्मीर में फ़ारूक़ अब्दुल्ला साहेब को ही। उनकी बहु भी गैर-मुस्लिम हैं, तो दामाद तो चर्चित चेहरे व सौम्य युवा सांसद सचिन पायलट ही हैं.. फिर भी पता नहीं फ़ारूक़ साहेब को क्या हो जाता है..? लगते हैं कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग मानने से इनकार करने..!! अरे भाई साहेब.. आपके बाद की जेनरेशन तो यहाँ तक पहुँच गयी और आप जो हैं कश्मीर को अब भी अलग बता रहे..!! कश्मीर अपना अविभाज्य अंग है कि नहीं मितरोँ..? है ना..

..जय हिन्द.. जय भारत.. अखण्ड भारत..👍

– कुमार प्रियांक..

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