एकेश्वरवाद और धर्म के मामले में भी भारत इसी पूर्वाग्रही दृष्टी का शिकार हुआ!

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ब्लॉग (यूनाइटेड हिन्दी) – Govinda Chauhan : मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद (१८३०-१९१०) ने अपने ‘सुखनदान-ए-फारस’ नामक ग्रन्थ में लिखा लिखा है की “हिन्द ने अपने इल्म का सरमाया फारस को दिया , फारस ने उसको मिस्र को दिया I मिस्र ने दोनों से लेकर यूनान को दे दिया । यूनान ने रूमिया (रोम) को दिया।रूमिया , यूनान एवं फारस ने अरबो को दिया और फिर अरब से वह तमाम एशिया और यूरोप में फ़ैल गया “ एक प्रकार से देखा जाए तो यह एक भारतीय की इस चिंता को जाहिर करता है की विश्व को उस दृष्टिकोण से न देखा जाए जिस दृष्टिकोण से पश्चिम बाकी दुनिया को देखता है , खासतौर पर भारत को  मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद के इस उदगार को यूरो-सेंट्रिक अवधारणा के प्रति एक विद्रोह के रूप में साबित करता है जो की उपनिवेशवाद के संरक्षण में हर जगह फल फूल रही थी और इस चीज़ पर बल देती थी की हर बेहतर चीज़ पश्चिम से ही पूरब की तरफ आती थी । खैर इतिहास इस बात का गवाह है की जब जब कोई मानव सभ्यता में कोई राजनीतिक सत्ता अपने शीर्ष पर रहकर दीर्घ काल तक एक व्यापक भौगौलिक फलक पर अपना साम्राज्य स्थापित करती है तो वो स्वयं को ही सभ्यता का उद्गम स्त्रोत मान लेती है।

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एकेश्वरवाद और धर्म के मामले में भी भारत इसी पूर्वाग्रही दृष्टी का शिकार हुआ और धीरे धीरे पश्चिम की साम्राज्यवादी शक्तियों ने चाहे वो अरब हो या यूरोप ने भारत की पराजित एवं दमित जनसँख्या के सामाजिक मनोविज्ञान को भी इसी एकतरफा चिंतन और मूल्य बोध से प्रभावित कर दिया । भारत में धर्म कभी भी एक नबी या एक अवतार का निर्माण नहीं रहा है । अनेक संतो , मुक्त चिंतको , महात्माओं और दृष्टाओ ने इसकी आत्मा को निरंतर जीवन दिया और इसकी सेवा की ।

हिन्दू धर्म बहुत प्राचीन काल से , दो प्रकार के ग्रंथो पर आधारित रहा है । इनमे से एक को निगम और दुसरे को आगम कहने की परंपरा है । वेद , ब्राहमण , आरण्यक, उपनिषद इत्यादि निगम ग्रंथो की श्रेणी में आते है और रामायण , महाभारत , पुराण इत्यादि आगम ग्रंथो की श्रेणी में आते है और इसमें प्राग्वैदिक , वैदिक और गैर वैदिक धारा , श्रुतियो और परम्पराओं का आख्यान है और यह हमेशा से समन्वयवादी रहे है और इनकी उत्पत्ति शिव , शक्ति या विष्णु से मानी जाती है जो की पुरुष कोटी में होने के बावजूद भी ईश्वरीय गुण संपन्न माने जाते है । इसके विपरीत निगम ग्रन्थ जीवन के भावार्थ के बारे में चिंतन करते है।

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