ब्लॉग : खुद अपने हाथ से ‘शहजाद’ उसको काट दिया…

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ब्लॉग : ( केशर देवी ) – 19 वीं शताब्दी के अंत में पंजाब के कादियान नाम की जगह से एक इस्लामी फिरका उठ खड़ा हुआ। इसके बानी (संस्थापक) मिर्ज़ा गुलाम अहमद थे। इस्लाम के 1300 साल में मिर्ज़ा गुलाम अहमद संभवतः वो पहले शख्स थे जिन्होंने अपने मजहब विस्तार के लिये “धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन” विषय को आधार बनाया। मिर्ज़ा साहेब वही काम उस जमाने में कर रहे थे जो आज शेख अहमद दीदात ने किया है या जाकिर नाइक कर रहा है यानि दूसरे के मजहबी किताबों को पढ़ो और फिर उसकी मनमानी व्याख्या कर उसे अपने मजहब विस्तार का आधार बना लो।

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मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने शुरुआत वेदों पर आक्षेप करके की पर सौभाग्य से उस समय आर्य समाज अपने पूर्ण यौवन पर था इसलिये हिन्दुओं को नीचा दिखा कर अपने मजहब में खींचने का अवसर उन्हें नहीं मिल पाया। वेदों पर किये उनके हर आक्षेपों पर वैदिक विद्वानों ने उन्हें मुंहतोड़ जबाब दिया पर ये अवसर ईसाई धर्मगुरुओं को नहीं मिल पाया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद इंजील के ऊपर महारत रखते थे और कई बार उन्होंने ईसाई पादरियों को शास्त्रार्थ में धूल चटाया था। ईसा मसीह सलीब पर मरे नहीं थे बल्कि वो वहां से बचकर हिन्दुस्तान आ गये थे और कश्मीर में दफ़न हुए थे, ये सिद्धांत भी मिर्ज़ा गुलाम अहमद का ही था जिसके ऊपर बाद में सैकड़ों लोगों ने शोध किया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद के सामने आने से ईसाई विद्वान् डरते थे, इसलिये जब मिर्ज़ा गुलाम अहमद की मृत्यु हुई तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे बड़े मुस्लिम विद्वान् ने उनके लिये जो लेख लिखे उसमें बड़े गैर-मामूली अल्फाजों में उन्हें श्रद्धांजलि दी। ये बात बहुत कम लोगों को हजम होगी कि अल्लामा इकबाल मिर्ज़ा गुलाम अहमद के बड़े शागिर्दों में थे और एक समय अहमदी हो गये थे। अपनी किताबों में उन्होंने मिर्ज़ा गुलाम अहमद की बेंइतेहा तारीफ की है। मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने तो पूरी सिख जाति को ही मुसलमान घोषित करने का प्रयास किया था।

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यानि मिर्ज़ा गुलाम अहमद इस्लाम के वो सिपाही थे जिन्होंने सबसे पहले मुस्लिमों को ये सिखाया कि मजहब विस्तार तर्क से भी किया जा सकता है और एक्के-दुक्के लोगों को अपने मजहब में लाने की बजाय पूरे मजहब को कैसे अपने दीन में लाया जाये पर चूँकि बाद में उन्होंने खुद को नबी वगैरह घोषित करना शुरू कर दिया और पूरा मुस्लिम विश्व उनके खिलाफ फतवे की तलवार खींचकर सामने आ गया। इस्लाम के जिस सिपाही की उर्जा गैर-मुस्लिमों को लांछित करने और उन्हें मुस्लिम बनाने में में खर्च हो रही थी वो अब अपने बचाव में खर्च होने लगी और फिर गैरों से शास्त्रार्थ का उन्हें वक़्त ही नहीं मिला।

जो मुसलमान पाकिस्तान के निर्माण के लिये जिन्ना और इकबाल के नाम के साथ रहमतुल्लाहअलैहे लिखते हैं उन्हें पता नहीं ये इल्म है भी कि नहीं कि पाकिस्तान निर्माण में सबसे बड़ा योगदान अहमदियों का था। मुस्लिम लीग को आर्थिक बल देने के लिए इन्होंनें अपनी पंजाब की तमाम जागीरें लुटा दी और पाकिस्तान निर्माण का राह प्रशस्त किया था।

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मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने बहुत पहले मुस्लिमों से ये अपील की थी कि जिहाद-बिल-सैफ (तलवार से जिहाद) का हुक्म मंसूख हो चुका है पर मुस्लिम इस बात पर विचार करने की जगह उनकी जान के पीछे पड़ गये। आज तारीख उठाकर देख लीजिये अगर मुस्लिम समाज ने मिर्ज़ा साहेब की वो बात मान की होती तो आज दुनिया में उनकी इतनी बदनामी नहीं होती जो जिहाद की अवधारणा के चलते हो रही है। कुरान की काफी हद तक अक्ल में आने वाली विज्ञान सम्मत व्याख्या की शुरुआत मिर्ज़ा साहेब ने ही की थी जिसे बाद में सर सैयद अहमद खान ने आगे बढ़ाया पर दुर्भाग्यवश अपने इस सिपाही को भी मुस्लिमों ने यहूदियों का एजेंट और मुर्तद कह कर धर्म बहिष्कृत कर दिया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद और सर सैयद को अगर ये मुर्तद नहीं ठहराते तो सच्चर समिति की रपट कम से कम इतनी बुरी नहीं होती।

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इनके एक तीसरे हीरो थे आरिफ मोहम्मद खान जिन्होनें ये समझ लिया था कि हर मजहबी ग्रन्थ के लिये ये लाजिम है कि उसकी काल-सापेक्ष व्याख्या की जाये और इसी हेतू उन्होंने Quran and Contemporary Challenges नाम से एक किताब लिखी पर दुर्भाग्य से आरिफ मोहम्मद खान भी आज बाहर बैठा दिए गये हैं।

अब आज यही काम तारेक फ़तेह भी कर रहे हैं। तारेक ने इस्लाम नहीं छोड़ा है और न ही तारेक ने कभी नबी या कुरान के खिलाफ कुछ कहा है। वो भी इस्लाम के ही सिपाही हैं, उनकी वेदना ये है कि उनके प्यारे दीन को कट्टरपंथी मानसिकता ने बदनाम कर दिया और इसी के लिये वो मार खाकर भी अल्लाह के इस्लाम का प्रसार कर रहें हैं। दुर्भाग्यवश मुसलमान यहाँ भी तारेक को अपना दुश्मन माने बैठे हैं।

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ऊपर मैंनें जितने नाम गिनाये ये सबके सब आपके सच्चे सिपाही थे जिनकी आपने कद्र न की। ये वो लोग थे या हैं जो आपको गैरों के साथ नज़र मिलाकर बात करने का हौसला दे सकते थे, जो आपको इल्म में आगे लेकर जा सकते थे। मगर आपको न तो सभ्य तरीके से शास्त्रार्थ की जरूरत महसूस होती है, न ही आपको ये लगता है कि अपनी चीजों की काल-सापेक्ष व्याख्या आपका मेयार ऊँचा करेगी और न ही आप जिहाद की अवधारणा को छोड़कर विश्व को शांति और सहअस्तित्व का आश्वासन देना चाहतें हैं उल्टा आप अपने मजहब के ऐसे आला लोगों को ही दीन से खारिज कर देतें हैं तो फिर आपके लिये फरहत शहजाद का शेर ही सबसे बैठता सटीक है। फरहत कहतें हैं….

खुद अपने हाथ से शहजाद उसको काट दिया
कि जिस दरख़्त की टहनी पे आशियाना था

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