ब्लॉग : देशभर में जगह-जगह एकसाथ किसान आन्दोलनों की बाढ़ सी क्यों आ गई ?

हनुमान बेनीवाल
( निर्दलीय विधायक, राजस्थान ) :
 आज बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, पत्रकार व आर्थिक विशेषज्ञ यह समझने में नाकाम हो रहे है कि देशभर में जगह-जगह एकाएक किसान आन्दोलनों की बाढ़ सी क्यों आ गई?

अभी भी ये लोग किसानों के आंदोलन को, किसानों के आक्रोश को हमेशा की तरह नजरअंदाज करने का ढोंग कर रहे है। किसानों के आक्रोश को भुनाने के चुनावों में बड़े-बड़े वादे किए गए थे लेकिन सत्ताधीशों का रुख हमेशा ही कुर्सी मिलते ही किसानों के प्रति हिकारत भरी नजरे गड़ाकर बैठ जाते है।जिस प्रकार अंग्रेज सरकार लगान ठोककर बैठ जाती थी उसी प्रकार वर्तमान सरकारें धान के गोदाम भरकर मुंह मोड़ लेती है। किसान मरे या जियें इससे किसी को कोई फर्क नही पड़ता है।

विडंबना देखिये इस देश के हुक्मरानों की एक मजदुर की न्यूनतम मजदूरी की दर 245₹ से लेकर 500₹ तक तय की गई है उसके हिसाब से एक महीने में मजदुर का वेतन लगभग 7350₹ बनता है और एक किसान के पूरे परिवार की मासिक कमाई 3350₹ है। तमाम दावों-वादों के बाद मोदी सरकार तीन साल बाद इस नए दावे तक पहुंची है कि 2022 में किसान की आय दुगुनी अर्थात 6,700₹ करने का प्रयास करेगी।

आप सोचिये हुक्मरानों की नीतियां व भविष्य का खाका अगर इस प्रकार का होगा तो निराशा में डूबे किसानों को आत्महत्या करने से कैसे रोका जा सकेगा?

फसल बीमा के नाम पर बीमा कंपनियों ने हजारों करोड़ रूपये किसानों से लूट लिए, सब्सिडी के नाम पर अपने चहेतों की खाद, बीज व कृषि उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर हजारों करोड़ लुटाये जा रहे है और भिखारी के रूप में किसान को पेश किया जा रहा है।

बैंकों के कुल एन पी ए का 1% भाग 70 करोड़ किसानों के नाम है तो 97% बैंकों का एन पी ए लगभग 1942 उद्योगपत्ति डकारकर बैठे है।

पुरे देशभर में विभिन्न आंकड़ों के हिसाब से लगभग 4.5 लाख करोड़ रूपये किसानों पर कर्ज है जो कुल जीडीपी का लगभग 3% के करीब बैठता है। जबकि उद्योगपत्तियों का कर्ज जो विलफुल डिफाल्टर है वो 6.4 लाख करोड़ रूपये है जिसको बैंको ने एन पी ए घोषित कर रखा है जो कुल जीडीपी का लगभग 4.5% बैठता है। एक तरफ देश की 70करोड़ आबादी और दूसरी तरफ 2000 से भी कम लुटेरे! इनकी तुलना कहाँ व कैसे होगी?

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किसान कोई विलफुल डिफाल्टर नहीं है, देरी से ही लेकिन कर्ज अदा करता है, कर्ज को रोटेट कर रहे है। बाकी लगभग 11.5 लाख करोड़ उद्योगपत्तियों पर कर्ज है।

अडानी की कंपनियों की कुल एसेट 64000 करोड़ रूपये है और बैंकों द्वारा 72000 करोड़ रूपये कर्ज दे दिया गया है।जनता के खून-पसीने की कमाई टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा होती है और ये सत्ताधीश अपने चहेते उद्योगपत्तियों को सस्ती ब्याज दरों पर बाँट देते है।

जनता जब मुलभुत सुविधाओं के लिए आंदोलन करती है तो टका सा जवाब मिलता है कि सरकारी खजाने में पैसे नहीं है।जब किसानों के कर्जमाफी की मांग उठती है तो कहा जाता है कि इससे अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जायेगी। देश की कुल जीडीपी 144 लाख करोड़ रूपये है। अगर उसमे से 4.5 लाख करोड़ रूपये निकल जाएंगे व उससे देश की 70 करोड़ की आबादी को राहत मिलती है तो इतना रोना-धोना क्यों?

जब तक इस देश का किसान समृद्ध नहीं होगा, जब तक इस देश का गाँव खुशहाल नहीं होगा तब तक विकास का सपना कभी पूरा नहीं होगा। खेत-खलिहानों में बिल्डरों को खड़ा करके देश की समृद्धि का रास्ता नहीं निकलेगा।

अगर हुक्मरान चाहते है कि इस देश से गरीबी हटे, इस देश में मुलभुत सुविधाओं का इंतजाम हो, देश प्रगति के पथ पर दौड़े तो हुक्मरानों को दिल्ली से निकलकर गाँवों की तरफ लौटना होगा। किसानों को केंद्र में रखकर नीतियों का निर्माण करना होगा। किसान झूठे वादों की गोलियां खा-खाकर सब्र ख़ो चूका है। वो अपने बच्चों को मौलिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा पा रहा है। कर्ज में फंसकर भी अगर बच्चों को पढ़ा दिया तो भी वो बच्चे बेरोजगारी में पाखंडवाद के चलते कभी कांवड़ लाने जा रहा तो कभी महाकाल दर्शन करने घूम रहा है। किसान पुत्रों को कहीं भी रोजगार नहीं मिल रहा है। शिक्षण संस्थाओं में किसानों के बच्चों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है। चौतरफा समस्याओं से घिरा हैरान-परेशान किसान क्या करेगा?

पहले किसान नियति समझकर आत्महत्या कर लेता था लेकिन आजकल किसानों के बच्चे थोड़े बहुत पढ़ लिए है। वो जानने लग गए है कि या नियति का खेल नहीं है बल्कि हुक्मरानों व उद्योगपत्तियों की मिलीभगत का व्यवस्था व खजाने पर डाके का परिणाम है। भ्रष्टाचार रुकना चाहिए, चोरी रुकनी चाहिए!यह अच्छी बात है लेकिन यह डाका भी अब रुकना चाहिए!

आज किसानों के बच्चे आत्महत्या के दौर से निकलकर संघर्ष की आगे बढ़ रहे है जिसका परिणाम है कि आज देश के विभिन्न इलाकों में उग्र किसान आंदोलन हो रहे है। अब आत्महत्याओं का दौर किसानों के बच्चे खुद रोक देंगे लेकिन जिस संघर्ष की ओर बढ़ रहे है, अगर समय रहते व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया गया! ठगी के वादे परोसने की कोशिश की गई तो देश को बहुत गंभीर परिणाम भोगने पड़ेंगे जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ हुक्मरानों की नाकामी जिम्मेदार होगी। फिर किसान नहीं, कृषि अधिकारी आत्महत्या करेंगे!किसान नहीं, कृषि मंत्री आत्महत्या करेंगे! फिर जनता नहीं, नेता आत्महत्या करेंगे!

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