पढ़िये जमीनी हकीकत- “कश्मीर गया तो भारत गया और नागालैंड गया तो भी भारत गया”….

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अभिजीत सिंह (यूनाइटेड हिन्दी) –  कभी पूर्वोत्तर की यात्रा पर भी निकलिये….
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जब असम में था तब तकरीबन दो साल मैंने वहां नौगांव जिले के लामडिंग में बिताये थे। लामडिंग का नाम असम के बाहर लोगों ने कम ही सुना हैं पर असम और पूर्वोत्तर के लोगों के बीच यह बड़ी मशहूर जगह है। इसकी कई वजहें हैं, यहाँ का खुशगवार मौसम, यहाँ से प्रायः देश के हर हिस्से के लिये ट्रेनों की सुलभता और इसी रास्ते होकर दीमापुर और सिलचर जैसे शहरों की रोमांचक यात्रा। इसके अलावा यहाँ आपको बंगाली, असमिया, बिहारी, नेपाली और पूर्वोत्तर की कई दूसरी जनजातियों की मिली-जुली संस्कृति भी देखने को मिल जायेगी। लामडिंग में भगवान भास्कर भी सुबह जरा जल्दी दर्शन देतें हैं। लामडिंग असम के उन चंद शहरों में एक है जहाँ बांग्लादेश से हुए घुसपैठ की भयावहता सबसे कम है।

नागालैंड के अंतिम सनातनी
नागालैंड के अंतिम सनातनी

बहरहाल मुझे लामडिंग इसलिये सबसे पसंद था कि यहाँ से मैं अक्सर डेढ़ घंटे की यात्रा कर नागालैंड की ओर निकल पड़ता था। लामडिंग से सुबह शताब्दी ट्रेन में बैठिये और लगभग डेढ़ घंटे बाद नागालैंड के एकमात्र मैदानी और सबसे खुबसूरत शहर दीमापुर में होंगे। आज लगभग शतप्रतिशत ईसाई बन चुके नागालैंड में यही एक शहर बचा है जो उस प्रदेश और वहां के लोगों के हिन्दू अतीत का प्रमाण सहेजे हुए है। दीमापुर का प्राचीन नाम हिडिंबापुर है। जब पांडवों को 13 वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला था तो अपने यात्राक्रम में देश के कई हिस्सों में जाने के साथ आज के नागालैंड में भी गये थे। जब वो नागाप्रदेश में आये तो दीमापुर में भीम और हिडिम्बा का विवाह हुआ था। भीम और घटोत्कच से जुड़े कई चिन्ह आज भी दीमापुर में मौजूद हैं. मतान्तरण के बाबजूद यहाँ रहने वाले दिमासा जनजाति के लोग सगर्व खुद को हिडिम्बा और भीमवंशी मानतें हैं।

हिन्दू अतीत का इतना चिन्ह संजोये रखने वाला दीमापुर भी अब ईसाई प्रभाव से बच नहीं पाया है। जो लोग हमें असहिष्णुता पर भाषण झाड़तें हैं उन्हें एक बार दिसंबर के आखिरी सप्ताह में पूर्वोत्तर के राज्यों का भ्रमण करके जरूर आना चाहिए। नागालैंड में किसी भारतीय को जाने के लिए “इनर लाइन परमिट” की आवश्यकता होती है पर दीमापुर को इससे बाहर रखा गया है मतलब दीमापुर तक आप बिना परमिट जा सकतें हैं। नागालैंड के लोग अक्सर आरामतलब होतें हैं इसलिये यहाँ के अधिकतर रोजगारों पर मारवाड़ी, बंगाली या और दूसरे लोगों का कब्ज़ा है। इन्हें धर्मनिरपेक्ष भारत के इस राज्य में कितनी स्वाधीनता है इसके कुछ उदाहरण देता हूँ। आप किसी भी मत-पंथ को मानने वाले भले हों पर आपके लिये वहां अनिवार्य है कि आप अपने दुकान में जीसस और क्रूस की तस्वीर लगायेंगे. यही देखने के लिये मैं वहां कई दुकानों में घुमा। हिन्दू अपने दुकान के पिछले हिस्से में छिपाकर माँ लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति रखते थे और सामने बड़े-बड़े कैलेंडरों में जीसस आशीष देते हुए पहले नज़र आ जाते थे। यही हाल दुकानों के बाहर भी था। क्रिसमस सप्ताह में हरेक दुकानदारों के लिये अपने दुकान की छतों पर डेविड का सितारा लगाना भी अनिवार्य था। मैंने एक दुकानदार से पूछा कि ईसा की फोटो और डेविड का सितारा आप सबने लगाया हुआ है ऐसा क्यों है? बोले, नहीं लगाकर मार खाये क्या ? यहाँ के युवकों और महिलाओं के कई संगठन सिर्फ यही देखने के लिये बनें हैं कि कौन से दुकानदार ने अपने दुकान में जीसस की फोटो या मूर्ति और डेविड का सितारा नहीं लगाया है। मैंने पूछा, आप पुलिस के पास क्यों नहीं जाते इसके खिलाफ ! तो वो हंसने लगे बोले, तीन साल पहले किसी ने ये हिमाकत की थी, बीच बाज़ार उसे गोली मार दी गई।

आगे पढ़िये – नागालैंड की जमीनी दास्तान 

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