ब्लॉग: माफी प्रायश्चित का मौका देती है पर दुःख ये है कि आपके पाप बहुत हैं….

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ब्लॉग: अभिजीत सिंह (यूनाइटेड हिन्दी) – कुछ साल पहले जयपुर में ‘धर्म संस्कृति संगम’ नामक संगठन ने दुनिया भर के उन लोगों का एक कार्यक्रम आयोजित किया था जो थे तो ईसाई या मुस्लिम पर उनके मन में ये प्रश्न था कि ठीक है आज हम ईसाई या मुसलमान हैं पर ईसा और मुहम्मद साहब से पहले हम क्या था, हमारी संस्कृति और परम्परायें क्या थीं और किन परिस्थितियों में हमें अपना मत-मजहब छोड़ना पड़ा था! इस कार्यक्रम के एक सत्र में जब उस समय के संघ सरसंघचालक सुदर्शन जी ईसाई चर्चों द्वारा दुनिया भर में किये गये विध्वंस लीलाओं का वर्णन कर रहे थे उस वक़्त मंच पर बैठे ईसाई पादरी ये सब सुनकर स्तंभित थे।

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ऐसे ही एक अमेरिकी ईसाई विद्वान् फादर कोमेल्ला की जब बोलने की बारी आई तो उन्होंने बड़े कातर और रूंधे गले के साथ ये कहा कि सुदर्शन जी के द्वारा ईसाई चर्च की विनाश लीला सुनने के बाद आज मैं खुद को उन सारे अपराधों में शरीक मानता हूँ जिसे आजतक ईसाई चर्चों ने दुनिया भर में किया है।

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फादर कोमेल्ला की यह स्वीकारोक्ति अनायास या तथ्यहीन नहीं थी कि ईसाई चर्चों ने दुनिया भर में अनगिनत संस्कृतियों और सभ्यताओं का विनाश करने के साथ धर्मान्तरण, अत्याचार और जनसंहार किया है। इसकी पुष्टि अब चर्च के प्रधान पोप और दुनिया भर के अनेक ईसाई पादरियों की स्वीकारोक्तियों और क्षमायाचनाओं से हो रही है और माफी मांगने का ये सिलसिला लगातार चल रहा है। 1992 में चर्च ने 1642 में गलीलियो के साथ किये अपने अपराध के लिये 350 साल बाद माफी माँगी थी। दुनिया भर के कई चर्चों के फादरों के ऊपर बाल यौन शोषण के बीस हज़ार से अधिक मुकदमें चल रहे थे जिससे छुटकारा पाने के लिये कैथोलिक चर्च ने कुछ साल पहले पीड़ित बच्चों के परिवारों से न सिर्फ माफी माँगी बल्कि बतौर मुआवजा उन्हें हजारों करोड़ डॉलर की एकमुश्त राशि भी दी।

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यही नहीं 2001 में पोप जान पॉल द्वितीय ने एक मेल के माध्यम से उन तमाम कैथोलिक फादरों की ओर से माफी माँगी जिनके यौन शोषण के चलते कई मासूमों की जिंदगियाँ नरक हो गई थी। पिछले साल जब पोप फ्रांसिस अमेरिका और लैटिन अमेरिका की यात्रा पर थे तब उन्होंने उपनिवेश काल में अमेरिका के मूल निवासियों के खिलाफ चर्च द्वारा किए अत्याचारों में रोमन कैथलिक चर्च की भूमिका के लिए माफी मांगी। इससे पहले लैटिन अमेरिका के बोलिविया में भी पोप ने इसी तरह की माफी मांगी थी। अभी कल यानि 26 नवंबर को पोप ने 1954 में रवांडा में किये ईसाई मत प्रचार के लिये की गई 8 लाख हत्यायों के लिये सार्वजनिक क्षमायाचना की।

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कैथोलिक चर्च आप दुनिया से अपने अपराधों की माफी मांग कर किसी पर एहसान नहीं कर रहें हैं बल्कि अपने पापों का बोझ कुछ हल्का कर रहें हैं, आपके निर्देशों के कारण आपके लोगों ने दुनिया की जितनी संस्कृतियाँ को निगला है, जितनी बर्बर हत्यायें की हैं, यूरोप में चुड़ैल कहकर महिलाओं पर जितने अत्याचार कियें हैं और फिर उन अत्याचारियों को संत की उपाधि दी है वो सारे पाप इतने ज्यादा हैं कि उन सबके लिये के अगर आप प्रलय के दिन तक भी रोज़ माफी मांगेंगे तब भी उसका प्रायश्चित संभव नहीं है और हाँ, हमारे भारत में गोवा में की गई नृशंसता, उत्तर-पूर्व, झारखण्ड, छतीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों में किये आपके पापों का हिसाब तो अभी हमने आपसे माँगा ही नहीं है। अभी तो आपको दुनिया के कई मत पंथों से, अपने अंदर के ही विभिन्न संप्रदायों से, यहूदियों से, हिन्दुओं से माफी मांगनी बाकी है।

बेहतर है समय रहते आप चेत जायें और कम से कम अपने पापों के लिए माफी मांगने की गति को और तीव्र करें ही साथ ही अपने असहिष्णु और विस्तारवादी चरित्र को भी पूरी तरह बदलें अन्यथा पाप बटोरने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। महान दार्शनिक वाल्टेयर के शब्दों में कहें तो आपके ईसाइयत प्रसार ने काल्पनिक सत्य के लिए धरती को रक्त से नहला दिया है।

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माफ़ी प्रायश्चित का मौका देती है पर दुःख ये है कि आपके पाप बहुत हैं…. इसलिये यहोवा के लिये, अपने जीसस के लिये और सारी मानवजाति के लिये अब कम से कम इस विस्तारवाद, पशुता, रक्त-चरित्र और असहिष्णुता को विराम दीजिये।

~ अभिजीत

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