इन ब्राह्मण-बनियों ने मिलकर इस भारत को आज बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है….

ब्लॉग: (Jitendra Mahala) देश का हर मां-बाप चाहता है कि उसके बच्चे बेहतरीन अंग्रेजी स्कूल में पढ़े और क़ामयाब इंसान बने, लेकिन मां-बाप के चाहने से क्या होता है ? गांधी और नेहरू के करीबी घनश्याम दास बिड़ला ऐसा नहीं चाहते थे। घनश्याम दास बिड़ला ने देश में शिक्षा को धंधा बना दिया।

सेठ शिवनारायण बिड़ला ने पिलानी में अपने पोतो जीडी बिड़ला और आरडी बिड़ला के लिए साल 1901 में पाठशाला के नाम से स्कूल की शुरूआत की। 1922 में यह स्कूल मिडिल स्कूल बन गया और बाद में आगे बढ़ते हुये यह बिड़ला स्कूल पिलानी बन गया। आज बिड़ला स्कूल पिलानी में कक्षा चार और पांच की सालाना फीस तीन लाख चौदह सौ रूपये (3,01,400), कक्षा छ से आठ की सालाना फीस तीन लाख पचीस हज़ार नौ सौ रूपये (3,25,900), कक्षा नौ और दस की सालाना फीस तीन लाख अड़तालीस हज़ार चार सौ रूपये (3,48,400) हैं।

बिड़ला स्कूल पिलानी स्कूल नहीं है, इस देश में ग़रीबों के सपनों की हत्यारीन हैं। पिलानी शिक्षा की नगरी नहीं है यह शिक्षा के क़ारोबार का अड्डा है। यहां शिक्षा एक धंधा है।

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DISCOVERY OF INDIA: Prime Minister Jawahar Lal Nehru riding a camel with GD Birla

देश में शिक्षा को धंधा बनाने की शुरूआत घनश्याम दास बिड़ला ने की थी। देश ने बिड़ला को 1957 में देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरीक सम्मान ‘पद्म विभुषण” दिया गया था। बिड़ला गांधी के बहुत करीबी आदमी थे, बिड़ला ने गांधी को लगातार आर्थिक मदद दी, गांधी की हत्या होने से चार महिन पहिले वे दिल्ली में बिड़ला के घर पर रूके। नेहरू तो बिड़ला के साथ ऊंट की सवारी करने ख़ुद पिलानी आया करते थे।

गांधी, बिड़ला और नेहरू का शानदार याराना था। ब्राह्मण-बनिया याराना था। राजनीति, धंधा, राष्ट्रभक्ति, महानता और समाजसेवा साथ-साथ चल रही थी। कुल मिलाकर गांधी ने अपने बिरादर बनियों के लिए टूटकर काम किया। गांधी स्वेदशी का नारा लगाते रहें और देखते ही देखते देश के बनियों ने देश के व्यापार और उद्योगधंधों पर कब्जा कर लिया।

G. D. Birla accompanying. Mahatma Gandhi on his stroll from the Birla House, New Delhi.

बनियों ने बिड़लों ने देश में शिक्षा को धंधा बना दिया। आज गोयनका, सिंघानिया, अंबानी, अडानी, मोदी सब के सब बनियों ने देश में शिक्षा को धंधा बना कर छोड़ दिया है। इस तरह देश में शिक्षा क्रांति संपन्न हुई और गांधी, नेहरू और बिड़ले महान हो गये।

देशी बनियों को फिर से स्थापित करने का श्रेय गांधीजी को देना चाहिए। स्वदेशी के नाम पर फिर से देश के करोड़ों लोगों को गुलामी में धकेल दिया। कितनी मूर्खता पूर्ण बात थी कि ब्रिटेन में कपड़ा फेक्टरियाँ लग रही थी और गांधी फेक्टरियों की स्थापना भारत मे करवाकर रोजगार पैदा करने के लिए आंदोलन न करके भारत के लोगों को चरखा चलाने की सलाह दे रहे थे!

यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम की पूरी टीम की लेखनी आजकल किसान पुत्रों में प्रेरणा बन रही है। राजस्थान के लोग भी अब सोशल मीडिया के माध्यम से पत्रकारिता में हाथ आजमाने लगे है। राजस्थान में वसुंधरा मेडम का सरकारी स्कूलों का निजीकरण इन बिड़ला अम्बानी अडानी को खुश करने और शिक्षा को व्यवसाय बना देने का प्रयास है। यह कोई छोटा-मोटा फैसला नही है इस फेसलो से हमारी आने वाली पीढ़ियों के सपने बर्बाद हो जाएंगे। गरीब मजदूर किसान कहाँ से 4-5 लाख सालाना एक बच्चे की शिक्षा पर खर्च कर पायेगा।

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