क्या सभी स्वतंत्र चैनल NDTV के साथ एकजुटता दिखाते हुए 9 से 10 नवंबर तक 24 घंटे का ब्लैकआउट करेंगे?

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चुनाव से पहले आपकी भाषा ये थी !!

ब्लॉग – महावीर प्रसाद खिलेरी (स्वतंत्र लेखक, यूनाइटेड हिन्दी) : कल मैंने द हिन्दू अख़बार की साईट पर यह खबर पढ़ी कि केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने पठानकोट एयरबेस की संदिग्ध रिपोर्टिंग की वजह से NDTV को चेतावनी दी है और इस न्यूज़ चैनल का प्रसारण एक दिन के लिये बंद कराने पर विचार कर रही है।

हालाँकि पिछले 48 घंटे से मेरे कई मित्र यह जानकारी भी शेयर कर रहे हैं कि फैसला ले लिया गया है और 9 नवंबर की तारीख तय कर भी कर दी गयी है। वैसे इस बावत कोई पुष्टि वाली खबर मेरी निगाह में नहीं आई है। जो भी हो, अगर सचमुच सरकार ने यह फैसला ले लिया है या लेने का मन बना रही है तो यह सरकार का एक बहुत बड़ा आत्मघाती कदम होगा।

वैसे, वर्तमान सरकार के नासमझ रणनीतिकारों के लिये यह कोई नयी बात नहीं है। ये लोग हमेशा से ही अपने विरोधियों को शहीदाना रुख अख्तियार करने का मौका देते रहे हैं। क्षमा कीजियेगा मेरी इन कड़वी बातों के लिये। पिछले कुछ दिनों से मैं खुद को लगातार विवादित राजनीतिक मसलों से दूर रखने की बहुत कोशिश करता रहा हूँ, क्योंकि यह मेरी समझ में आ गया था कि इसका हासिल कुछ नहीं होना है। इन दिनों ज्यादातर मीडियाकर्मी लोगों की राजनीतिक निष्ठाएँ तय हो चुकी हैं। उनके लिये हर बहस का मतलब खुद को सही साबित करने का पैंतरा है। जिनकी कोई राजनीतिक निष्ठा नहीं है, उनकी तटस्थता को समझने के लिये कोई तैयार नहीं है।

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फिर, इस तरह की बहस में अटके रहने से अपनी रचनात्मकता का भी नुकसान होता है। फिर भी मैं भी इस वैचारिक बहस में कूद रहा हूँ, क्योंकि कुछ मसलों में चुप रहना गुनाह होता है। यह सच है कि NDTV मूलतः बीजेपी-संघ-मोदी विरोधी चैनल है। और इसमें कोई बुराई या दो राय नहीं है, क्योंकि मीडिया का काम प्रतिपक्ष की भूमिका निभाना ही होता है। जैसा 2 नवंबर को रामनाथ गोयनका पुरस्कार वितरण समारोह में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने प्रधानमंत्री मोदी के सामने जो कहा उसकी गूँज मोदी के कानों में लंबे समय तक सुनाई देगी ! राजकमल झा ने कहा “अच्छी पत्रकारिता सेल्फी पत्रकार नहीं परिभाषित करेंगे जो आजकल कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहे हैं, जो हमेशा आपने आप से अभिभूत रहते हैं, अपने चेहरे से, अपने विचारों से जो कैमरे को उनकी तरफ रखते हैं, उनके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती है, उनकी आवाज़ और उनका चेहरा ! आज के सेल्फी पत्रकारिता के दौर में अगर आपके पास तथ्य नहीं हैं तो कोई बात नहीं, फ्रेम में बस झंडा रखिये और उसके पीछे छुप जाइये !” मगर कई दफा हमलोग सरकार की कमियों को उजागर करते-करते अंध विरोधियों में तब्दील हो जाते हैं। हम राजकमल झा के बदले कांग्रेसी प्रवक्ता संजय झा में बदल जाते हैं, जो संयोग से उन्हीं के भाई हैं। हमलोग एक जनपक्षधर पत्रकार के बदले विपक्षी पार्टियों के पॉलिटिकल टूल में बदल जाते हैं।

NDTV के साथ भी कई मामलों में ऐसा ही हुआ है। जैसा स्टिंग ऑपरेशन करने में माहिर कोबरा पोस्ट जैसी साईट करती रही है। मीडिया का जनपक्षधर होना और सरकार की कमियों को उजागर करना ठीक है, मगर किसी पोलिटिकल पार्टी के एजेंट की तरह काम करना गलत है। फिर चाहे वह ज़ी न्यूज़ हो या इंडिया टीवी?

ज़ी न्यूज़ हो या इंडिया टीवी के कुछ दिहाड़ी वाले पत्रकारों की वजह से इन दिनों भारतीय द्वारा हम मीडिया वालों की निष्पक्षता को एक दागदार गाली की तरह समझा जाने लगा है। जनपक्षधर पत्रकारिता को पोलिटिकल एजेंटों वाली पत्रकारिता के साथ कंफ्यूज किया जा रहा है। modi_media

खैर….. यह अलग प्रसंग है। मूल प्रसंग यह है कि सरकार को किसी चैनल पर एक दिन का बैन लगाने जैसे फैसले लेने चाहिए या नहीं?

….. और इस मामले में मेरा मानना है कि एक बार तो NDTV या ज़ी न्यूज़ या इंडिया टीवी का पोलिटिकल एजेंट में तब्दील होना क्षम्य है। मगर किसी सरकार का राजनीतिक वजहों से फैसला लेना न सिर्फ अक्षम्य है बल्कि इसका हर स्तर पर तीखा विरोध करने की जरूरत है। यह वही सरकार है जो गिरिराज सिंह, योगी आदित्यनाथ और साध्वियों के घोर सांप्रदायिकता वाले बयान पर मौन धारण कर लेती है। जिसके मंत्री एक बुजुर्ग सैनिक की ख़ुदकुशी पर गैर जिम्मेदाराना बयान देते हैं। जिसके राज में आतंकी आर्मी कैंप में घुस कर सैनिकों की हत्या कर देते हैं, आतंकी जेल का ताला खोल कर फरार भी हो जाते हैं। और इन तमाम मसलों में जिनसे राष्ट्र की सुरक्षा का सीधा सम्बन्ध है, किसी को सजा नहीं होती! ऐसे में एक चैनल की रिपोर्ट पर सजा सुनाने का सिर्फ इतना ही मतलब है कि आप अपने राजनीतिक विरोधियों को दण्डित करने की कोशिश कर रहे हैं।

एनडीटीवी पर केन्द्र सरकार की दण्डात्मक कार्रवाई बताती है कि पीएम मोदी इस चैनल को जरूर देखते हैं। यह आंखों की पीड़ा है। यह फासिज्म नहीं है, यह तो तानाशाह की चाय की चुस्की है!! सवाल यह है पठानकोट की घटना पर एनडीटीवी के अलावा दूसरे टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग क्या सही थी ?

मोदी सरकार पारदर्शिता का प्रदर्शन करे और बताए कि एनडीटीवी के कवरेज में किस दिन और समय के कार्यक्रम को आधार बनाकर और किन मानकों के आधार पर फैसला लिया गया और एनडीटीवी से उसका पक्ष जानने की कोशिश की गयी या नहीं ? एनडीटीवी को अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए और केन्द्र सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।

पठानकोट के एंटी आतंकी ऑपरेशन का लाइव कवरेज कब से खतरे के दायरे में आ गया ? आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन का लाइव कवरेज अपराध है, लेकिन यह सन् २०१५ से कानून बना। यानी कुछ न मिले तो आतंकी कवरेज के बहाने टीवी वालों को बांस करके रखो।

जब देश में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है तब बीजेपी के नेता बोर होने लगते हैं। लोकसभा चुनावों के बाद जब एक वक्त लग रहा था कि बीजेपी आसानी से दिल्ली में जीत जाएगी, तो पार्टी ने केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार कर करके उसे चुनाव जीता दिया। अब फिर जब सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पार्टी के पक्ष में माहौल बन रहा था, तो एनडीटीवी पर बैन का उड़ता तीर लेकर उसे जबरदस्ती शहीद बना दिया। यह कन्हैया के मामले से ही जाहिर है कन्हैया बेवजह तूल देकर हीरो बना दिया ! हो सकता है आपका इसमें भी कोई भविष्य दिखाई देता हो! इस वक्त सरकार की टीम में समझदार लोगों का भयंकर अकाल है। ये लोग ऐसे हैं जो सड़क के किसी भी कोने में केले का छिलका क्यों न गिरा हो उसे ढूंढ कर पांव वहीँ रखेंगे। इन्हें विवादों को हैंडल करना नहीं आता केवल पैदा करना आता है। और हमेशा गलत फैसले लेते हैं। अगर यह फैसला सचमुच हुआ तो इसका यही अर्थ होगा कि अब इनसे सरकार सम्भल नहीं रही है और ये जाने की तैयारी कर रहे हैं। बहरहाल, व्यवसाय/कर्म/जन्म से पत्रकार होने तौर पर मैं इस फैसले पर सख्त नाराजगी प्रकट करता हूँ। और इस सजा के विरुद्ध चलने वाली हर मुहिम को तमाम विसंगतियों के बावजूद अपना समर्थन देता हूँ।

मेरे सवाल : #NDTV ने अगर पठानकोट घटना की कवरेज के मामले में मानदंडों का कोई उल्लंघन किया था तो इसके परीक्षण की ज़िम्मेदारी NBSA (News Broadcasting Standards Authority) पर छोड़ी जानी चाहिए थी! यदि जाँच में NDTV दोषी सिद्ध होता तो NBSA द्वारा उसे उचित दंड भी दिया जाता।

जिन लोगों को नहीं मालूम, उन्हें बता दूँ कि NBSA के दंड प्रावधानों में यह भी शामिल है कि वह अति गम्भीर मामलों में दोषी चैनल के प्रसारण पर कुछ दिनों की रोक लगाने की सिफ़ारिश भी सरकार से कर सकता है। NDTV चैनल NBA (News Broadcasters Association) का सदस्य है, और उसे NBSA का फ़ैसला मानना पड़ता। वर्षों से NBSA अपनी ज़िम्मेदारी गम्भीरता से निभाता आ रहा है. फिर सरकार को इस मामले की जाँच अपने हाथ में लेने की क्या ज़रूरत थी?

NBSA की जाँच में यदि NDTV दोषी सिद्ध होता तो इससे सरकार की ही विश्वसनीयता बढ़ती कि वह सचमुच प्रेस की स्वतंत्रता की हिमायती है! लेकिन सरकार कैसा मीडिया चाहती है, यह तो मीडिया की मौजूदा हालत से समझ में आता ही है।

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जिस सरकार ने खुद पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को (निश्चित रूप से जिसमें आईएसआई के लोग शामिल रहे होंगे) पठानकोट एयरबेस के चप्पे-चप्पे का दौरा कराया, वो एनडीटीवी इंडिया पर पठानकोट हमले के उस कवरेज़ के लिए एक दिन का बैन लगा रही है जो हर चैनल व अखबारों में कमोबेश एक ही तरह से कवर किया गया था। चैनल से कहा गया है कि वो 9 नवंबर की रात 12.01 बजे से 10 नवंबर को रात 12.01 बजे तक कुछ भी न दिखाए। जाहिर है कि एनडीटीवी इंडिया को सरकार विरोधी रुख की सज़ा दी जा रही है। यह मीडिया का गला घोंटनेवाली ऐसी लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाई है जिसका विरोध न किया गया तो कल कोई भी नहीं बचेगा। इस समय एनडीटीवी इंडिया एकमात्र चैनल है जो सच को सच कहने की हिम्मत करता है और सरकार की हर बेज़ा हरकत पर वाजिब सवाल उठाता है। कल दूसरे चैनलों को भी एनडीटीवी इंडिया की तरह ब्लैकआउट किया जा सकता है। ऐसे में उचित यही होगा कि कम से कम हिंदी के सारे न्यूज़ चैनल एनडीटीवी इंडिया के साथ एकजुटता दिखाते हुए 9 नवंबर की रात से 10 नवंबर की रात तक 24 घंटे का ब्लैकआउट कर दें।

इस गंभीर मुद्दे पर मीडिया और पत्रकारिता से जुड़े कई बड़े लोगों की प्रतिक्रियाएं (यूनाइटेड हिन्दी पर) आने लगी है। इसी संदर्भ में इंडिया टीवी के पूर्व मैनेजिंग एडिटर और फिल्मकार विनोद कापड़ी ने वीडियो जारी कर NDTV पर लगे प्रतिबंध पर सवाल उठाया है ।

सुनिए क्या कहा उन्होंने –

(लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम स्‍वागत करता है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  unitedhindiweb@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें। अगर आप भी भारत के लिए ब्‍लॉग लिखने के इच्छुक लेखक है तो भी आपका यूनाइटेड हिन्दी पर स्वागत है।)

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