ब्लॉग: क्या भारत के किसानों सहित 80 करोड़ इंसान देशद्रोही व गद्दार है ?

ऐ भोले किसान, तू मेरी दो बात मान ले!
एक बोलना ले सीख, दूजा दुश्मन पहचान ले!!

MAHAVEER PRASAD KHILERI : आज इस देश मे सब जगह किसान आंदोलन चल रहे है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ किसान ही परेशान है लेकिन इस बार सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ी है। किसान इस देश की भटकी व्यवस्था के दल-दल में फंस चुका है।सिंचाई का पानी पर्याप्त नहीं मिलता, भूजल स्तर गहरा हो चुका है, पर्याप्त बिजली नहीं मिलती, खाद-बीज बहुत महंगा हो गया फिर भी किसी तरह पैदावार लेकर किसान मंडियों में जाते है तो पैदावार के उचित भाव मिलने के बजाय अपमान के घूंट पीकर लौटना पड़ता है। अब सरकार ने ट्रेक्टर व कृषि मशीनरी पर जीएसटी लगा दिया है। किसानों को दी जाने वाली 70% से ज्यादा सब्सिडी खाद-बीज व कृषि औजार बनाने वाली कंपनियां लूट रही है। किसान बुरी तरह से कर्ज के दलदल में फंस चुका है।

फसल बीमा योजना को बताते हुए मुझे एक बचपन की घटना याद आ गई। हमारे कस्बे में एक मेला लगा था। माँ ने दो रुपये दिए थे खर्चे के। मेले में रिंग फंसाकर सामान जीतने वाला खेल चल रहा था। किसान का बेटा था इसलिए सोचा कि रिंग में साबुन फंसा लेता हूँ। रिंग फेंक फेंककर दो रुपये लुटा दिए लेकिन रिंग में साबुन नहीं फंसा पाया क्योंकि साबुन रिंग से बड़ा था वो कभी फंसना नहीं था। मेरी तरह आज किसान नादान है और रिंग का खेल फसल बीमा योजना है। कंपनियां इस साल 10 हजार करोड़ रुपये कमा चुकी है लेकिन किसानों को मुआवजा मिला 2 रुपये/ 75 पैसे/ 5 रुपये!

एक तरफ किसान चौबीसों घंटे खेत मे पिसकर कर्ज में डूब रहा है तो दूसरी तरफ सीमा पर लड़ रहे किसानों के बेटों की लाशें सरकार तिरंगे में लपेटकर घर पहुंचा रही है। एक तरफ किसान बर्बाद होकर अपने ही खेत के पेड़ पर लटककर जान दे रहा है तो दूसरी तरफ किसानों के बेटों को सरकार काम देने के बजाय राम में उलझाकर बर्बाद कर रही है। 2014 में किये वादों को भुलाने के लिए सरकार व उनके सहयोगी संगठन तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे है। वैसे तो भारतीयों की आदत जल्द भूलने की है लेकिन इस बार का तमाशा इतना बड़ा है कि किसान भुलाए नहीं भूल पा रहा है।