सुभाषोक्ति: भक्त ही भगवान की हत्या करते है, भावना सोच को कुंद करती है।

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ब्लॉग :  शुभाष सिंह सुमन (यूनाइटेड हिन्दी) – किसी भी संज़ीदा मुद्दे पर भावुक होते ही आपकी सोचने की क्षमता कुंद हो जाती है। जब आप सोच नहीं पाते तो ऊल-जुलूल हरकतें करते हैं। ऐसी कि जिनपर तरस नहीं आती, सो सहानुभूति रखकर काम चला लेंगे।

जो तर्क नहीं करता वो धर्मांध है। जो तर्क नहीं कर सकता वो मूर्ख है। जिसमें तर्क करने का साहस नहीं वो गुलाम है :- गौतम बुद्ध

 RBI के पूर्व गवर्नर (सांकेतिक तस्वीर)
RBI के पूर्व गवर्नर (सांकेतिक तस्वीर)

पुराने बड़े नोट बंद करने के केंद्र सरकार के हालिया फैसले पर तमाम लोग अर्थशास्त्री बन बैठे। फेसबुक के पोस्टों से पीएचडी करने का भी अपना नुकसान है। हालाँकि, भावना के ज्वर में नुकसान का आकलन भावुक कर नहीं पाता है। तो, भावुकों ने गायन-वादन किया कि इस फैसले से कालाधन खत्म हो जाएगा, भ्रष्टाचार नियंत्रित हो जाएगा। ठीक है, मान लेते हैं। कोई शक नहीं कि यह सब एक हद तक होगा भी। पर किस कीमत पर होगा? इसका आकलन भावुक तो कतई नहीं कर सकेंगे! खासकर वे भावुक, जिन्होंने यह तय कर रखा है कि उनके भगवान कुछ गलत कर ही नहीं सकते। तयशुदा भावना, क्या कहें भी, बकौल रामाधीर सिंह यथोचित स्थान में डाल लीजिये।

देश की पूरी करेंसी का छियासी (86) प्रतिशत पाँच सौ और हजार में था। एक झटके में वह बंद हुआ। बाजार में आज मुद्रा की कमी है। मुद्रा नहीं होगा तो चीज़ों की माँग प्रभावित होगी। माँग गिरने से बाजार सुस्त होगा। परिणाम, अर्थव्यवस्था पिछड़ेगी। यह असर भी दूरगामी होगा। (उदाहरण के लिए देशभर के कई शहर व मार्केट की दुकानें बंद पड़ी है। खबर है की राजस्थान में तो चीनी की कीमत भी 250 रुपये दुकानदार बढ़ा चुके है खुल्ले के चक्कर में)

आज पुनः कॉलेज जाना हुआ। प्रोफेसर से आज अधिक देर तक बातें करने का मौका मिला। एक अच्छा पहलु दिखाया उन्होंने। पिछले गवर्नर राजन ने एनपीए पर जब सख्ती की तो लगातार तीन तिमाही से तमाम सार्वजनिक बैंकों का बैलेंसशीट कराह उठा। सार्वजनिक बैंकों का पैसा उद्योगपतियों के हाथों में जाकर एनपीए हो चुका है। बैंक मुख्यतः वेतनभोगी और पेंशनधारी लोगों के पैसे पर चल रहा था। एक झटके में हर वह पैसा बैंक के बैलेंसशीट पर आ गया, जो देश के आम का था। खासों का पैसा नहीं पहुँचा और न ही पहुँचेगा। मतलब कि हम-आप उद्योगपतियों की ऐय्याशी छुपाने का जरिया बने हैं।

इसी भाजपा ने जनवरी 2014 में तत्कालीन केंद्र सरकार के ठीक ऐसे ही फैसले पर चूड़ीतोड़ प्रदर्शन करते हुए कहा था कि यह आम लोगों का पैसा छीनने की साजिश है। अब वही साजिश अचानक पुण्यकर्म कैसे हो गयी? कोई भाजपाई कृपया बता दे यह।

कई बार जब देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो जाये, मुद्रा पर्याप्त अवमूल्यित हो जाये, सरकारें बदहाली छुपाने के लिये इस तरह के निर्णय लेती रही हैं। अब मुद्रा की छपाई ही कम की जाएगी। उपभोक्ताओं के हाथ से पहले ही सारी मुद्रा छीनी जा चुकी है। अब उपभोक्ताओं को सीमित मुद्रा ही मुहैया करायी जाएँगी, ताकि आप मनमुताबिक खर्च न सकें। सरकार की नियत में खोट की आशंका इसलिये भी बढ़ती है कि नये नोटों की उपलब्धता में जानबूझकर हीला-हवाली की जा रही है। कथित तौर पर रिजर्व बैंक पिछले कई महीने से नये नोट छापे जा रही थी और इसके लिये तैयारियाँ कर रही थी। बावजूद, नये नोट नहीं हैं बाजार में। मतलब इरादे में पहले से ही पर्दादारी थी।

आगे यह भी कि रिजर्व बैंक और सरकार के तमाम दावों के बाद भी यह स्पष्ट है कि नये नोटों के सुरक्षा फीचर पहले वाले से कमतर हैं। इनकी गुणवत्ता भी कमतर है। इनका जाली तैयार करना पहले से आसान होगा। तो क्या हासिल तमाम कवायदों का ?

एक और बात करते चलते हैं। दावा कि इस फैसले से रुपया मजबूत हुआ है। मने कॉमेडी चल रहा है क्या ? मूर्खों, रुपये की गति डॉलर के हिलने से तय होती है। अमेरिका में ट्रंप की अप्रत्याशित जीत ने निवेशकों को बुलियंस के लिये उकसाया। डॉलर को गिरना ही था और कमजोर डॉलर के कारण रुपये को मजबूती मिलनी ही थी! इसमें अजूबा कहाँ हुआ है ? लेकिन क्या आपको पता है पिछले दिन दिन के मुक़ाबले डॉलर आज अभी 12/11/2016 को एक बजे 3 रुपये जी हाँ तीन रुपये की बढ़त पर पहुंचा है।

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बाकी, पेशागत आदत है। पत्रकार हूँ, आशंकाएँ आकर्षित करेंगी हमको। बस उम्मीद कर सकते हैं कि तमाम आशंकाओं के परे सरकार की नियत साफ रहे। यदि आशंकाएँ सच हुईं, देन बी रेडी फोर फर्दर सिक्वेंसेज। देयर इज नथिंग वनली ब्राइट एंड दिस इज द हार्स ट्रथ।

(रामाधीर सिंह को भी मुखर करता चलूँ कि भावनाओं को रक्खो अपनी गा&^ में। यह कर लेने के बाद ही कमेंट्स में आकर अर्थशास्त्र पेलना। वैधानिक सूचना समाप्त।)

#सुभाषोक्ति!

(लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी यूनाइटेड हिन्दी डॉट कॉम स्‍वागत करता है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  unitedhindiweb@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें। अगर आप भी भारत के लिए ब्‍लॉग लिखने के इच्छुक लेखक है तो भी आपका यूनाइटेड हिन्दी पर स्वागत है।)

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