इसको ध्यान से पढ़ेंगे तो समझेंगे ! कालेधन पर कार्रवाई के खिलाफ कहर क्यों बरपा रहा है मीडिया.?

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ब्लॉग: Satish Chandra Mishra ( मेरी बातों में कड़ुआहट है, सच कहने की अकुलाहट है ) – कृपया पूरा पढ़िए ध्यान से पढ़िए तो आप समझ जायेंगे कि कालेधन पर कार्रवाई के खिलाफ कहर क्यों बरपा रहा है मीडिया.?

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पहले एक उदहारण : चुनावों में कालेधन का सर्वाधिक उपयोग और उस उपयोग में सबसे बड़ी हिस्सेदारी की सच्चाई कुछ यह है…
2009 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ की लोकसभा सीट कांटे की लड़ाई में फंसी हुई थी। अटल बिहारी बाजपेयी के राजनीतिक संन्यास के कारण 18 साल बाद लखनऊ की सीट पर भाजपा ने उनके स्थान पर लाल जी टण्डन को मैदान में उतारा था। कांग्रेस की तरफ से उसकी प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी मैदान में थी और बसपा ने हज़ारों करोड़ की संपत्ति के स्वामी, अरबपति व्यवसायी राजनीतिज्ञ अखिलेश दास गुप्ता को तथा सपा ने 70 के दशक की फिल्म हीरोइन नफीसा अली को मैदान में उतारा था।

इसके बाद शुरू हुआ था रोचक खेल : बसपा प्रत्याशी की चुनावी खबरों (विज्ञप्तियों) और उसकी जीत की संभावनाओं, एलानों और दावों वाली खबरों से अख़बारों के 3-3, 4-4 पेज रोजाना रंगे हुए नज़र आने लगे थे। भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशी की चुनावी खबरें 5वें और 8वें पन्नों के कुछ कॉलमों मात्र में सिमट कर रह गयी थीं। सपा प्रत्याशी की चुनावी खबरों की स्थिति और भी बदतर थी।

लखनऊ की लोकसभा सीट से सम्बन्धित 80% चुनावी खबरों पर बसपा प्रत्याशी का एकछत्र राज स्थापित हो चुका था। अख़बारों को पढ़कर ऐसा लग रहा था कि बसपा प्रत्याशी लखनऊ सीट पर जीत का नया रिकॉर्ड बनाने जा रहा है तथा भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशी चुनावी लड़ाई से बाहर हो चुके हैं। स्थिति इतनी भयावह और असहनीय हो गयी थी कि भाजपा के वयोवृद्ध प्रत्याशी लालजी टण्डन को अपनी चुनावी सभाओं के सार्वजनिक मंच से बाकायदा नाम लेकर लखनऊ की जनता से यह कहना पड़ा था कि “दैनिक जागरण” अख़बार मेरी खबरें नहीं छाप रहा है और जनता के सामने झूठ परोस रहा है। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं पैसे देकर खबरें छपवाऊँ !

टण्डन जी ने जो कहा था ठीक ही कहा था, क्योंकि जब चुनाव परिणाम सामने आया तो भाजपा के लाल जी टण्डन कांटे की लड़ाई में कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी को 40 हज़ार मतों से पराजित कर विजयी हुए थे। ध्यान रहे कि यह दोनों प्रत्याशी अख़बारों के अनुसार जीत की दौड़ से बाहर थे। अख़बारों के पन्नों में जो बसपा प्रत्याशी अखिलेश दास गुप्ता जीत का रिकॉर्ड बनाने जा रहा था वो भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों से काफी पिछड़कर तीसरे स्थान पर पहुंच गया था।

जब खुद को देश का सबसे बड़ा और पढ़ा जानेवाला कहे जानेवाले अखबार की यह स्थिति थी, वह भी किसी गाँव-गिरांव के दूरदराज के चुनावी क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में, तो अन्य स्थानों और अन्य अख़बारों का हाल क्या रहा होगा.? यह अनुमान आप स्वतः लगा लीजिये !!

लाखों रू प्रतिदिन के विज्ञापन मूल्य वाले एक पृष्ठ सरीखे तीन-तीन चार-चार पृष्ठों पर तीसरे स्थान पर आनेवाले किसी एक प्रत्याशी की ही चुनावी खबरों का कब्ज़ा क्या मुफ्त में हो जाता है.? उन खबरों के लिए पैसा कौन देता है.? क्या वह पैसा नम्बर एक का होता है.? जी नहीं… पैसा शतप्रतिशत कालाधन ही होता है जिसके लेनदेन की कोई रसीद ना दी जाती है ना ली जाती है…

न्यूज चैनलों पर खबरों की स्थिति इससे भी बदतर है। 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए एक न्यूज चैनल A2Z के यूपी ब्यूरोचीफ ने मुझे बुलाकर चुनावी खबरों की जिम्मेदारी संभालने का अनुरोध किया था। कार्य प्रारम्भ करने के तीन दिन बाद ही ब्यूरोचीफ और जनरल मैनेजर ने मुझे बुलाकर चुनावी विज्ञापनों/कवरेज की धनराशि वसूली के टारगेट का चिटठा मेरे सामने रख दिया था। मैंने उन्हें टका सा जवाब दिया था कि मैं पत्रकार हूं, खबरों का सेल्समैन या दलाल नहीं! मेरे इस जवाब के कुछ दिनों बाद ही मेरी विदाई हो गयी थी। जितने दिन काम किया था उसका पैसा भी नहीं मिला था।

लेकिन वो अकेला ऐसा न्यूज चैनल नहीं था! चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे मेरे कुछ परिचितों ने मुझसे इस शिकायत के साथ मदद का अनुरोध किया था कि भैया खबर दिखाने के लिए इतना इतना पैसा मांगा जा रहा है, विज्ञापन देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। मैं उनसे केवल सहानुभूति मात्र दर्शा कर रह जाता था…

अब बात मुख्य मुद्दे की, कि मीडिया क्यों तिलमिलाया हुआ है…???
3-4 महीनों बाद उत्तरप्रदेश, पंजाब और गोवा की विधानसभा के लिए चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में राजनीति के शातिर खिलाडी हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी लगभग पूरी कर चुके थे। चुनावों में दमखम दिखाने के लिए 500 और 1000 के नोटों के रूप में उनका कालाधन उनकी तिजोरियों, अलमारियों, बोरों और बक्सों में प्रतीक्षा कर रहा था अपना चुनावी प्रदर्शन प्रारम्भ करने की। उनके उस प्रदर्शन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी मीडिया की होती। यह सच आप उपरोक्त दो उदाहरणों से आसानी से समझ सकते हैं।

अतः अब आप आसानी से यह भी अनुमान लगा सकते हैं कि केवल नेताओं अफसरों व्यापारियों और कालाबाजारियों के पास ही नहीं बल्कि इन लोगों के पास भी कितना कालाधन किस रूप में है.? और ये लोग अपने अपने न्यूज चैनलों और अख़बारों में कालेधन के खिलाफ कार्रवाई के विरोध में कहर क्यों बरपा रहे हैं ?

 

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