दंगो में कभी साध्वी, तोगडिय-औवेसी, संगीत-आजम खान या भागवत नहीं मरेंगा! मरेगा तो किसान का बेटा ही….

किसानों तुम खुद क्यों हो कठघरे में? जब भी धार्मिक या जातीय दंगा होता है तो आपका नाम उसमे जरूर आता है। क्यों?

कहते है बिना ज्ञान की आर्थिक सम्पन्नता महाविनाश का कारण बनती है। यह आप पर सटीक बैठती है। नेतृत्वहीन भीड़ अराजकता का कारण बनती है। हजारों की संख्या में जातीय संगठन, हजारों किसान नेता, लाखों की संख्या में पदाधिकारी। इतना बड़ा हुजूम हुड़दंग नहीं करेगा तो क्या करेगा? कहीं कोई नियंत्रण नहीं। पिछली पीढ़ी शिक्षित नहीं थी। कोई बात नहीं। खेतों में खून पसीना एक करके थोड़ी बहुत पूंजी जोड़ ली। लेकिन यही पूंजी अगली पीढ़ी के लिए विनाश ला रही है। हमने ध्यान पूंजी जमा करने में ज्यादा दे दिया इसलिए अगली पीढ़ी को उच्चस्तरीय शिक्षा नहीं दिलवा पाये। यही अधकचरा युवा ज्ञान भविष्य समेटने में लगा हुआ है।

पास में कुछ हद तक गुजारा करने के लिए पूंजी तो है लेकिन 10 वीं,12वीं, स्नातक पास बेरोजगारों की फ़ौज भी हमने तैयार कर ली। अब हमारे युवा लोगों के पास काम कुछ नहीं है। हमने विलायत अर्थात शहर भेजकर इतिश्री कर ली। शहरों में समाज के ही ठग नेताओं ने जाति के नाम पर अपने जाल में फंसा लिया। कुछ समाज के लोग धर्म की भी ठेकेदारी में भी शामिल हो गए। खुश करने के लिए कई संगठनो ने पदाधिकारी बना दिया।बेरोजगार युवा को नेतागीरी का चस्का लगा दिया। राजनीति व सामाजिक संगठनों में रोज भर्ती निकलती है। रोज थोक में पद बांटे जाते है। एक ही योग्यता होनी चाहिए बस! बाप के पास पैसे होने चाहिए। ज्ञान के लिए कोई जगह नहीं है। सवाल करने पर सख्त पाबन्दी है।

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अब जरा सोचिये! ऐसी अनियंत्रित भीड़ को कौन अपने हिसाब से उपयोग नहीं करना चाहेगा! आदिकालीन कबायली समूहों की तरह छोटे-छोटे गुटों में तब्दील ये लोग हर जगह समाज का मटियामेट कर रहे है। जो चाहे वो एक गुट को बहकाकर जाति-धर्म के नाम पर दंगा करवा देता है और पुरे समाज को कठघरे में खड़ा कर देता है। हर नुक्कड़ पर ऐसी भीड़ नजर आ जायेगी। स्थिति बहुत ख़राब है। शाम को गाडी लेकर बेटा 5-7 दोस्तों के साथ घर पहुँचता है तो उनका ड्रेस कोड व चश्मे की स्टाइल देखकर मेले-कुचैले कपड़ों में लिपटा बाप यही सोचता है कि बेटा सफल हो रहा है। बेटा संगीत बजाता है “आजकल मेरे पाँव जमीं पर नहीं टिकते… “तो बाप सोचता है कि शायद बेटा भविष्य जान रहा है। खेती धीरे-धीरे नुकसान का सौदा साबित होने लग गई। जब किसी दंगे या आकस्मिक दुर्घटना में बेटे का शिकार होता है तो बाप को पता चलता है कि उनके बेटे के पांव जमीं पर क्यों नहीं टिक रहे थे?

दादरी कांड हो या बासनी कांड। हरियाणा का मिर्चपुर कांड हो या यूपी का मुजफ्फरनगर कांड। सब जगह यही नेतृत्वविहीन अधकचरा युवा ज्ञान कहर बरपा रहा है। हाथ में एंड्राइड फोन व चलने को गाडी दंगे के लिए सबसे उपयुक्त साधन है। जिसका यह बेरोजगारों की अनियंत्रित फ़ौज धड्ड्ले से उपयोग कर रही है। किसी भी समाज की उन्नति का पैमाना आर्थिक सम्पन्नता के साथ शांति व सदभाव का रहन-सहन है। लेकिन हमारे परिवारों में चिराग की जगह शैतान तैयार हो रहे है। जहाँ सबको पता है नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है लेकिन छोड़ता कोई नहीं है। सबको पता है रोग क्या है लेकिन इलाज करवाने को कोई तैयार नहीं होता।

किसान का बेटी हूँ….. अच्छी तरह से जानती हूँ कि जब गरीब किसान का बेटा जातीय-धार्मिक दंगों में फंसता है तो खेतों में खून-पसीना एक करते बूढ़े माँ-बाप के दिल पर क्या गुजरती है! एक किसान गर्मी-सर्दी, धुप-छाँव की बिना परवाह किये अपना जीवन खेतों में इसलिए कुर्बान करता है ताकि जो दर्द उन्होंने झेला है वो उनके बच्चों को न झेलना पड़े। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिसके सहारे उम्मीद पाले बैठे है वो एक दिन उनकी उम्मीदों को पलीता लगा देता है।

दोषी किसान नहीं है न ही उनके युवा बेटे है। मैं दोषी समाज के सक्षम लोगों को मानती हूँ। जो सामाजिक नेता है जो समाज से निकले राजनेता है। अपना पद पक्का करने के लिए समाज के युवाओं को दंगों की आग में झोंक रहे है। अगर समय रहते इन खादी में लिपटे शिकारियों को दरकिनार नहीं किया तो भविष्य बहुत अंधकारमय होगा। इसके लिए समाज के बुद्धिजीवी लोगों को आगे आकर युवाओं का मार्गदर्शन करना होगा। ध्यान रहे दंगो में कभी साध्वी प्राची- साध्वी सरस्वती (सरस्वती तो मेरे पति की पूर्व गर्लफ्रेंड रह चुकी है), तोगडिय-औवेसी नहीं मरेंगे और न ही समाज का ठेकेदार संगीत सोम-आजम खान या मोहन भागवत मेरगा। सिर्फ और सिर्फ गरीब किसान का बेटा मरेगा। आज आग मेरे दिल में जली है तो कल आपके दिल में जलेगी।

डूबी है मेरी अंगुलियां मेरी ही लहू में !
यह कांच के टुकड़ों पर भरोसे की सजा है !!

केशर देवी चौधरी

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