ब्लॉग : भारत दरिद्रता को सींचता आया है….

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ब्लॉग : Sainny Ashesh Musoorie (यूनाइटेड हिन्दी) – धन का शास्त्र समझना चाहिए। धन जितना चले उतना बढ़ता है। चलन से बढ़ता है। समझो कि यहां हम सब लोग हैं, सबके पास सौ—सौ रुपए हैं। सब अपने सौ—सौ रुपए रखकर बैठे रहें! तो बस प्रत्येक के पास सौ—सौ रुपए रहे। लेकिन सब चलाएं। चीजें खरीदें, बेचें। रुपए चलते रहें। तो कभी तुम्हारे पास हजार होंगे, कभी दस हजार होंगे। कभी दूसरे के पास दस हजार होंगे, कभी तीसरे के पास दस हजार होंगे। रुपए चलते रहें, रुकें न कहीं। रुके रहते, तो सबके पास सौ—सौ होते। चलते रहें, तो अगर यहां सौ आदमी हैं तो सौ गुने रुपए हो जाएंगे। इसलिए अंग्रेजी में रुपए के लिए जो शब्द है वह करेंसी है। करेंसी का अर्थ होता है: जो चलती रहे, बहती रहे। धन बहे तो बढ़ता है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

अमरीका अगर धनी है, तो उसका कुल कारण इतना है कि अमरीका अकेला मुल्क है जो धन के बहाव में भरोसा करता है। कोई रुपए को रोकता नहीं। तुम चकित होओगे जानकर यह बात कि उस रुपए को तो लोग रोकते ही नहीं जो उनके पास है, उस रुपए को भी नहीं रोकते जो कल उनके पास होगा, परसों उनके पास होगा! उसको भी, इंस्टालमेंट पर चीजें खरीद लेते हैं। है ही नहीं रुपए, उससे भी खरीद लेते हैं। इसका तुम अर्थ समझो।

एक आदमी ने कार खरीद ली। पैसा उसके पास है ही नहीं। उसने लाख रुपए की कार खरीद ली। यह लाख रुपया वह चुकाएगा आने वाले दस सालों में। जो रुपया नहीं है वह रुपया भी उसने चलायमान कर दिया। वह भी उसने गतिमान कर दिया। लाख रुपए चल पड़े। ये लाख रुपए अभी हैं नहीं, लेकिन चल पड़े। इसने कार खरीद ली लाख की। इसने इंस्टालमेंट पर रुपए चुकाने का वायदा कर दिया। जिसने कार बेची है, उसने लाख रुपए बैंक से उठा लिए। कागजात रखकर। लाख रुपए चल पड़े। लाख रुपयों ने यात्रा शुरू कर दी!

अमरीका अगर धनी है, तो करेंसी का ठीक—ठीक अर्थ समझने के कारण धनी है। भारत अगर गरीब है, तो धन का ठीक अर्थ न समझने के कारण गरीब है। धन का यहां अर्थ है बचाओ! जबकि धन का अर्थ होता है चलाओ। जितना चलता रहे उतना धन स्वच्छ रहता है। और बहुत लोगों के पास पहुंचता है। इसलिए जो है, उसका उपयोग करो। खुद के उपयोग करो, दूसरों के भी उपयोग आएगा।

लेकिन यहां लोग हैं, न खुद उपयोग करते हैं, न दूसरों के उपयोग में आने देते हैं! और धीरे—धीरे हमने इस बात को बड़ा मूल्य दे दिया। हम इसको सादगी कहते हैं। यह सादगी बड़ी मूढ़तापूर्ण है। यह सादगी नहीं है। यह सादगी दरिद्रता है। यह दरिद्रता का मूल आधार है।

चलाओ! कुछ उपयोग करो। बांट सको बांटो। खरीद सको खरीदो। धन को बैठे मत रहो दबाकर! यह तो तुम्हें करना है तो मरने के बाद, जब सांप हो जाओ, तब बैठ जाना गड़ेरी मारकर अपने धन के ऊपर! अभी तो आदमी हो, अभी आदमी जैसा व्यवहार करो।

~ ‘कहै वाजिद पुकार’ नामक पुस्तक में ओशो नामक आग।

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