ब्लॉग: जीसस क्राइस्ट उर्फ ईसामशीह, भारत और मतान्तरण का गौरख धंधा….

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ब्लॉग : अभिजीत सिंह (यूनाइटेड हिन्दी) – आज से तकरीबन दो हज़ार साल पहले जब यहूदिया के बैतलहम में एक बालक का जन्म होने वाला था तो उसके जन्म से काफी पूर्व हिमालय की गुफाओं में बैठे कुछ योगियों को ये मालूम हो गया था कि यहाँ से हजारों मील दूर कोई दिव्य अस्तित्व वजूद में आने वाला है। उन्हें ये भी मालूम था जिस देश में ये बच्चा अवतरित होने वाला है वहां का माहौल और आसुरी प्रवृति इस लायक नहीं है कि वहां इस दिव्य वजूद की बेहतर परवरिश हो सकेगी। इसलिये इस बालक के जन्म से काफी पूर्व तीन योगी भारत से निकलकर बैतलहम की ओर चले और अपनी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर उन्होंने उस बालक के जन्म का समय भी ज्ञात कर लिया। इसलिये सितारों का ठीक-ठीक निरीक्षण करते हुए वो उस बालक के जन्म के वक़्त वहां पहुँच गये। अपने यात्रा के क्रम में उनकी मुलाक़ात युहन्ना से भी हुई।

जब ईसा का जन्म हुआ तो उसकी माता के ऊपर लोगों ने ये आरोप लगाने शुरू कर दिये कि तू बदकारा है और ये बच्चा तेरी बदकारी के नतीजे में जन्मा है। उस वक़्त भारत से गये उन हिन्दू योगियों ने लोगों को किसी तरह समझाया बुझाया और मरियम से कहा कि मूसा की व्यवस्था के अनुरूप ये लोग तुझे मार डालेंगे इस लिये बेहतर है कि तू हमारे साथ अपने बच्चे को लेकर भारत चल, जहाँ तेरे इस दिव्य पुत्र की बेहतर परवरिश हो जायेगी जो सारे मानवजाति के हित में होगा पर मरियम और युसूफ इसके लिये तैयार नहीं हुए। उन योगियों में से दो वापस लौट गये और तीसरा वहीं रूक गया ताकि ईसा और उसके परिवार को वो किसी तरह समझा सके। वो योगी वहां पांच साल रहा और बालक ईसा को हर तरह से भारत लाने की कोशिश की पर जब ईसा अपने माँ-बाप को छोड़कर जाने को तैयार न हुए तो उस योगी ने उसे अपना पता लिखकर दिया और कहा कि जब भी तुझे ये एहसास हो कि यहोवा ने तुझे किसलिये इस धरती पर भेजा है तो मेरे पास भारत आ जाना और इतना कहकर वो योगी वहां से लौट आये।

जब ईसा बाढ़ साल के हुए तो उन्हें उस योगी की बात याद आई और वो एक व्यापारिक काफिले के साथ सिंध के रास्ते भारत आ गये फिर कश्मीर और तिब्बत की गुफाओं में भ्रमण करते हुए जगन्नाथ पुरी, बनारस और नेपाल होते हुए 30 साल की उम्र में यहाँ से अपने देश लौट गये। भविष्यपुराण शकराज के साथ उनकी मुलाक़ात का वर्णन करता है. भारत में उन्होंने अठारह साल गुजारे और इस अवधि में उन्होंने नाथ सम्प्रदाय के सन्यासियों के साथ रखकर योग विधा सीखी, बौद्ध लामाओं के साथ तिब्बती चिकित्सा विधियाँ भी सीखी, जगन्नाथ पुरी में कई हिन्दू ग्रंथों का अध्ययन किया फिर बनारस में ज्योतिष शास्त्र और खगोल विधा सीखी।

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