भक्त्न लोगों राष्ट्रवाद की आड़ में इस्लामिक करण की इ सब होशियारी न चोलबे…

Click on Next Button

ब्लॉग: अभिजीत सिंह (यूनाइटेड हिन्दी) – मौलाना अबुल आला मौदूदी जमाते-इस्लामी के संस्थापक थे। इस्लाम के जितने बड़े विद्वानों को मैं जानता हूँ उनमें मौलाना मौदूदी साहेब अपने विचारों को लेकर सबसे ईमानदार थे। उन्होंने कभी भी न तो अपने मजहबी इतिहास को गलत ढ़ंग या फरेब रूप में पेश किया और न ही अपने उद्देश्यों को लेकर कभी झूठ बोला। उनकी सारी किताबें इस बात की गवाह हैं। rashtrvaad

मौलाना साहब शरीयत आधारित शासन के बड़े हिमायती थे, वो ये कहा करते थे कि “इस्लाम सिर्फ एक मजहबी तरीका या इबादत के लिये नहीं है बल्कि यह एक सम्पूर्ण जीवन प्रणाली है जिसे हर जगह अपना सुधारात्मक पोग्राम नाफ़िज करना है और इसी के लिये वह तमाम मानव जाति को इस्लाम की ओर आमन्त्रण देता है, जो यह दावत कबूल कर ले वह वैश्विक मुस्लिम उम्मा का मेम्बर है। अब इस मुस्लिम उम्मा का दायित्व है कि वह किसी गैर-इस्लामिक निज़ाम की हुक्मरानी को मिटाने की कोशिश करे और उसके स्थान पर सामाजिक समानता के उस हुकूमत को कायम करे जो किताबुल्लाह बताती है”।

मौदूदी साहब की एक बड़ी मशहूर किताब है “इस्लाम और आधुनिक आर्थिक दृष्टिकोण”। इस किताब में उन्होंने बड़े विस्तार से ये बताया है कि मानव जाति के इतिहास में जो बैंकिंग की व्यवस्था चलती रही वो ब्याज आधृत होने के चलता शोषण करने वाली है और इस्लाम के समतामूलक आदेश के विरुद्ध है और इसलिए उन्होंने आधुनिक या किसी भी तरह की बैंकिंग व्यवस्था को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। उनकी उस सोच के नतीजे में इस्लामिक बैंक का विचार इस खित्ते में जन्मा।

ये बैंकिग व्यवस्था काम कैसे करेगी इस पर विमर्श करने से अधिक आवश्यकता उन कुछ प्रश्नों पर विचार करने की है जिसे ताज़ा-ताज़ा सेकुलर बनी भाजपा देखना नहीं चाह रही है। मेरे प्रश्न हैं:-

१. इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू करने के पीछे सबसे बड़ा तर्क ये है कि चूँकि भारत की बैंकिंग प्रणाली ब्याज आधारित है इसलिये अपने यहाँ की एक बड़ी आबादी बैंकों से दूर रहती है, तो उनका समावेशन भी बैंकिंग व्यवस्था में हो सके इसके लिये इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली की आवश्यकता है। प्रश्न है, भारत के बैंक सरकार और सदन द्वारा तय “बैंकिंग विनियमन अधिनियम” के आधार पर है, पर अब अगर लोगों को देश की सरकार द्वारा स्थापित मानकों पर आधृत व्यवस्था को अस्वीकार कर शरीया आधारित व्यवस्था को चुनने की छूट दी जाती है तो क्या यह देश के पंथनिरपेक्ष चरित्र के अनुकूल है और क्या कल को और समुदाय वाले इस आधार पर अपनी मांगे नहीं रखेंगे?

२. ब्याज को लेकर जो बातें कुरान में है, करीब-करीब वैसी ही बातें हमारे धार्मिक और स्मृति ग्रंथों में भी है, तो कल को क्या हिन्दुओं की मांग पर हिन्दू-कानून आधृत बैंकिंग व्यवस्था शुरू की जायेगी ?

३. इस बात की क्या गारंटी है कि इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू करने के सरकार के फैसले को दावत देने वाले मौलाना इस रूप में नहीं प्रचारित करेंगे कि देखो तुम्हारी अपनी सरकार ने हमारी ब्याज रहित बैंकिंग व्यवस्था को मान्यता दी है। आपकी सरकार ने ये मान्यता इसलिये दी है क्योंकि इस्लामी शरीयत आधुनिक विश्व के लिये सबसे उपयोगी है। वो आगे ये भी कह सकतें हैं कि जैसे इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली आपको स्वीकार करना पड़ा वैसे ही इस्लाम की दूसरी मान्यताएं भी आपको आने वाले समय में स्वीकार करनी पड़ेगी क्योंकि ये सर्वोत्कृष्ट व्यवस्थाएं है।

४. ऐसा क्यों है कि भारत या विश्व में आज इस्लामिक बैंकिंग के ऊपर काम करने वाली जो भी संस्थायें हैं उन सबका पृष्ठपोषण करने वाली संस्थायें दावती हैं? इसका क्या अर्थ है इसे समझने या समझाने की क्या आवश्यकता नहीं है ?

आज ब्याज आधारित बैंकिंग वो नहीं अपना रहे तो आप उन्हें शरीयत आधारित पैरेलल बैंकिंग दे रहें हैं, कल को उन्हें बीमा कम्पनियों से जोड़ने के लिये आप उन्हें ऐसा ही कोई शरीयत आधारित विकल्प चुनने की छूट देंगे फिर परसों कुछ और,  और ये फिर ये तुष्टिकरण लगातार चलता रहेगा।

ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिसे मुस्लिम-ब्रदरहुड, जमाते-इस्लामी और मौलाना मौदूदी के ख्यालों से अनभिज्ञ लोग नहीं समझ सकते।अलबत्ता जो लोग समझ रहें हैं उनका विरोध इस मसले पर लगातार रहेगा। केवल “हम राष्ट्रवादी हैं- हम राष्ट्रवादी हैं” का शोर मचा कर आप भाग नहीं सकते, तुष्टिकरण की आड़ में पुष्टिकरण करने नहीं दिया जायेगा।

~ अभिजीत सिंह

Click on Next Button

To Share it All 🇺🇸🇮🇹🇩🇪NRI Citizens