बाल दिवस की आड़ में धर्मांधों पर थप्पड़ मारने का मन हो तो क्या करूँ!

ब्लॉग- कुमार अवस्थी (यूनाइटेड हिन्दी) : बच्चे का जीवन जैसे शुरू होता है टॉफी के साथ । शायद ही कोई बुरा मानता हो किसी बच्चे का टॉफी खाना । न न करते खिला ही देता है बच्चों को टॉफी । ऐसे ही धर्म और संस्कार भी है जो टॉफी खाते खाते ही शुरु हो जाता है जीवन में । सब खुश होते हैं जब बच्चे धर्म और संस्कार शुरू कर रहे होते हैं । 

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अचानक कुछ बच्चे टॉफी खाना बन्द कर देते हैं और फिर शुरू होता है दौर कुछ दूसरी चीज़ों का जैसे चाय ,सुपारी,पान मसाला ,सिगरेट फिर शराब …… और तमाम नशे। ऐसे ही कुछ बच्चों के लिए धर्म भी है जो शुरू तो बेसिक चीज़ों से ही होता है पर फिर गूढ़ होने लगता है ।नई नई व्याख्यायों में जाने लगता है ।

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बेसिक तो भूल ही चुका होता है । बस लोगो को दिखाने के लिए बेसिक का दिखावा करता है कि मैं आज भी उस धर्म रूपी टॉफी को चूस रहा हूँ जैसे शुरू किया था।

वो जानता है कि लोग मुझे इन गूढ़ और अजीब सी लगने वाली व्याख्याओं पे तो इज्जत देंगे नही और न ही समर्थन तो जो बेसिक है वो करते रहो तो लोग उसी तरह प्यार इज्जत करते रहेंगे जैसे टॉफ़ी खाने वाले बच्चे को करते हैं ।  लोग उसकी बातो पे शक तो करेंगे पर चुप रहेंगे क्योकि मेरे बेसिक आ जायेगे उनके और मेरे बीच में ,बोलेंगे देखो आज भी नियम का पक्का इंसान है । और वो इन्ही बेसिक नियम की आड़ में जो भी करे वो धार्मिक ही है।

उनसे जब कोई पूछे आप का धर्म ऐसा है तो फट से वो आपको टॉफी दिखाएंगे कि हमारा तो धर्म इस टॉफी के जैसा मासूम है ।  अब बेसिक तो किसी धर्म का ख़राब है नही तो कोई क्या बहस करे ।

कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो टॉफी के बाद किसी और जुगाड़ में नही जाते, बस बाकी जीवन में कभी कभार किसी खास मौके पर टॉफी चूस के खुश हो लेते हैं । ये बच्चे धर्म को भी कुछ ऐसे ही जीते हैं ।

थोड़ा बहुत बेसिक किया और फिर व्यस्त हो गए अपनी ज़िन्दगी में । कोई त्यौहार पड़ा,कोई ब्याह शादी तो बेसिक का जो ध्यान आया कर लिया और धर्म से जुड़ाव महसूस कर लेते हैं ।

अब ये जो कभी कभार धर्म रुपी टॉफी खाते हैं बड़े होकर ये उन सिगरेट पीने वालो से ,धर्म के नशा करने वालोँ से पूछ ले कि तुम्हारा धर्म ये सिखाता है तो बोलेंगे….. नही हमारा धर्म वो नही , हमारा धर्म तो ये टॉफी के जैसा है ।

कुछ चतुर सुजान बच्चे ऐसे भी होते हैं जो धर्म के नशीले रूप को देख के बेसिक रुपी टॉफी को भी गाली देते हैं और नास्तिक कहलाना पसन्द करते हैं।  कुछ सारी ज़िन्दगी टॉफी ही खाते खिलाते रहते हैं यानी बेसिक्स को ही फॉलो करते रहते हैं। धर्म के नशे को टॉफी , चाय के नशे से ऊपर नही जाने देना चाहिए।

मेरा मानना तो यही है।

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